Thursday, March 26, 2026

चालाकी कुछ ज्यादा कर बैठी .....


एक जंगल में एक लोमड़ी रहती थी। वह जब भी शिकार पर जाती थी। उसके पीछे चीते पड़ जाते थे और उसे शिकार छोड़ कर भागना पड़ता था।


कई बार तो उसे अपनी जान बचानी भी मुश्किल हो जाती थी। इसी सब से परेशान होकर उसने एक तरकीब सोची।


उसने अपने आपको चीता बनाने की सोची लेकिन यह हो कैसे इसी सोच विचार करते करते उसे एक उपाय सूझा।


वह बढ़ई के पास जाती है।


लोमड़ी: बढ़ई मेरी पूंछ को काट कर लकड़ी की चीते जैसी पूंछ लगा दो। नहीं तो मैं तेरे बच्चों को उठा ले जाउंगी।



बढ़ई डर के मारे लोमड़ी की पूंछ काट कर लकड़ी की पूंछ लगा देता है।


फिर वह एक डॉक्टर के पास जाती है।


लोमड़ी: मेरा मुंह चीते जैसा पिचका दे नहीं तो तेरे बच्चे उठा ले जाउंगी।



डॉक्टर उसका मुंह चीते जैसा कर देता है।


उसके बाद लोमड़ी एक पेंटर के पास जाती है।


लोमड़ी: मेरे शरीर पर चीते जैसा रंग कर दे नहीं तो मैं तेरे बच्चों को उठा ले जाउंगी।



पेंटर उसके शरीर पर चीते जैसे रंगीन चित्रकारी बना देता है।


अगले दिन वह चीतों के बीच में पहुंच जाती है। सभी चीते हैरान रह जाते हैं कि यह नया चीता तो बहुत ताकतवर है। अब वह चीतों के संग शिकार करती और मजे से चीतों के साथ बैठ कर खाती थी। कोई भी उसे पहचान नहीं पा रहा था।



इसी तरह कुछ दिन बीत जाते हैं।


एक दिन लोमड़ी चीतों के साथ शिकार पर जाती है। तो चीते एक हिरण के पीछे भागते हैं। लोमड़ी भी उनकी नकल करके भागने लगती है। लेकिन वह चीतों जितनी नहीं भाग पाती।


इससे चीतों को कुछ शक हो जाता है। वे शाम को उससे पूछते हैं।


चीता: अरे तू आज भागा क्यों नहीं तेरे कारण शिकार हाथ से निकल गया।


लोमड़ी: आज मेरी तबियत ठीक नहीं थी कल देखना मैं अकेेले ही शिकार कर लाउंगा।


अगले दिन जब सब शिकार पर जाते हैं तभी बारिश हो जाती है। लोमड़ी का सारा रंग बह जाता है। यह देख कर चीते समझ जाते हैं वह उसके पीछे पड़ जाते हैं। इसी भाग दौड़ में उसकी लकड़ी की पूंछ भी गिर जाती है।


लोमड़ी किसी तरह जान बचा कर लोमड़ियों के झुण्ड में पहुंच जाती है।



वहां जाकर कोई उसे नहीं पहचानता।


लोमड़ी: मैं लोमड़ी हूं। मैं तो बचपन से तुम्हारे साथ रहती थी।


लोमड़ी: अरे ये पता नहीं कौन है न तो इसके हमारे जैसी पूंछ है न इसका मुंह लोमड़ी जैसा है। इसे मार मार कर भगा दो नहीं तो ये हमारे बच्चों को खा जायेगी। इसका मुंह चीते जैसा है।


यह सुनकर सारी लोमड़ी उसे मारने दौड़ पड़ती हैं।


लोमड़ी किसी तरह जान बचा कर दूर जंगल में पहुंच जाती है।



अब वह न तो अपने झुण्ड की रही न चीतों के झुण्ड की।


शिक्षा: अपनों के साथ रहने में ही भलाई है। दूसरों की नकल करने से अपने भी साथ छोड़ देते हैं।

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