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Saturday, January 10, 2026

हार में ही जीत है !

माँ को अपने बेटे, साहूकार को अपने देनदार और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भानु को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवत-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान। 


उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाक़े में न था। बाबा भानु उसे “सुलतान” कह कर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, ख़ुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। ऐसे लगन, ऐसे प्यार, ऐसे स्नेह से कोई सच्चा प्रेमी अपने प्यारे को भी न चाहता होगा। उन्होंने अपना सब-कुछ छोड़ दिया था, रुपया, माल, असबाब, ज़मीन, यहाँ तक कि उन्हें नागरिक जीवन से भी घृणा थी। अब गाँव से बाहर एक छोटे-से मंदिर में रहते और भगवान का भजन करते थे; परंतु सुलतान से बिछुड़ने की वेदना उनके लिए असह्य थी। मैं इसके बिना नहीं रह सकूँगा, उन्हें ऐसी भ्रांति-सी हो गई थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते, ऐसे चलता है जैसे मोर घन-घटा को देखकर नाच रहा हो। गाँवों के लोग इस प्रेम को देखकर चकित थे, कभी-कभी कनखियों से इशारे भी करते थे, परंतु बाबा भानु को इसकी परवा न थी। जब तक संध्या-समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।



दामोदर सिंह उस इलाक़े का प्रसिद्ध डाकू था। लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे। होते-होते सुलतान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची। उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। वह एक दिन दोपहर के समय बाबा भानु के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया।



बाबा भानु ने पूछा, “दामोदर सिंह, क्या हाल है?”

दामोदरसिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, “आपकी दया है।”


“कहो, इधर कैसे आ गए?”

“सुलतान की चाह खींच लाई।”


“विचित्र जानवर है। देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे।”

“मैंने भी बड़ी प्रशंसा सुनी है।”


“उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी!”

“कहते हैं देखने में भी बहुत सुंदर है।”


“क्या कहना! जो उसे एक बार देख लेता है, उसके हृदय पर उसकी छवि अंकित हो जाती है।”

“बहुत दिनों से अभिलाषा थी, आज उपस्थित हो सका हूँ।”


बाबा और दामोदर सिंह दोनों अस्तबल में पहुँचे। बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, दामोदर सिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से। उसने सैकड़ों घोड़े देखे थे, परंतु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से कभी न गुज़रा था। सोचने लगा, भाग्य की बात है। ऐसा घोड़ा दामोदर सिंह के पास होना चाहिए था। इस साधु को ऐसी चीज़ों से क्या लाभ? कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा। इसके पश्चात् हृदय में हलचल होने लगी। बालकों की-सी अधीरता से बोला, “परंतु बाबाजी, इसकी चाल न देखी तो क्या?”


बाबा जी भी मनुष्य ही थे। अपनी वस्तु की प्रशंसा दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय अधीर हो गया। घोड़े को खोलकर बाहर लाए और उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगे। एकाएक उचककर सवार हो गए। घोड़ा वायु-वेग से उड़ने लगा। उसकी चाल देखकर, उसकी गति देखकर दामोदर सिंह के हृदय पर साँप लोट गया। वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर अपना अधिकार समझता था। उसके पास बाहुबल था और आदमी भी। जाते-जाते उसने कहा, “बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।”



बाबा भानु डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती थी। सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी। प्रतिक्षण दामोदर सिंह का भय लगा रहता, परंतु कई मास बीत गए और वह न आया। यहाँ तक कि बाबा भानु कुछ लापरवाह हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नाई मिथ्या समझने लगे।

संध्या का समय था। बाबा भानु सुलतान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता। कभी घोड़े के शरीर को देखते, कभी उसके रंग को, और मन में फूले न समाते थे।



सहसा एक ओर से आवाज़ आई, “ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना।”

आवाज़ में करुणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया। देखा, एक अपाहिज वृक्ष की छाया में पड़ा कराह रहा है। बोले, “क्यों तुम्हें क्या कष्ट है?”


अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा, “बाबा, मैं दुखियारा हूँ। मुझ पर दया करो। रामाँवाला यहाँ से तीन मील है, मुझे वहाँ जाना है। घोड़े पर चढ़ा लो, परमात्मा भला करेगा।”

“वहाँ तुम्हारा कौन है?”


“दुर्गेश वैद्य का नाम आपने सुना होगा। मैं उनका सौतेला भाई हूँ।”



बाबा भानु ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे।


सहसा उन्हें एक झटका-सा लगा और लगाम हाथ से छूट गई। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है। उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख़ निकल गई। वह अपाहिज डाकू दामोदर सिंह था।

बाबा भानु कुछ देर तक चुप रहे और कुछ समय पश्चात् कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, “ज़रा ठहर जाओ।”



दामोदर सिंह ने यह आवाज़ सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गरदन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूँगा।”

“परंतु एक बात सुनते जाओ।”


दामोदर सिंह ठहर गया। बाबा भानु ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा क़साई की ओर देखता है और कहा, “यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है। मैं तुमसे इसे वापस करने के लिए न कहूँगा। परंतु दामोदर सिंह, केवल एक प्रार्थना करता हूँ। इसे अस्वीकार न करना, नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा।”


“बाबाजी, आज्ञा कीजिए। मैं आपका दास हूँ, केवल यह घोड़ा न दूँगा।”


“अब घोड़े का नाम न लो। मैं तुमसे इस विषय में कुछ न कहूँगा। मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।”

दामोदर सिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसका विचार था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भानु ने स्वयं उसे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? दामोदर सिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भानु के मुख पर गड़ा दीं और पूछा, “बाबाजी, इसमें आपको क्या डर है?”


सुनकर बाबा भानु ने उत्तर दिया, “लोगों को यदि इस घटना का पता लग गया तो वो किसी ग़रीब पर विश्वास न करेंगे।”

और यह कहते-कहते उन्होंने सुलतान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया जैसे उनका उससे कभी कोई संबंध ही न रहा हो। बाबा भानु चले गए। परंतु उनके शब्द दामोदर सिंह के कानों में उसी प्रकार गूँज रहे थे। सोचता था, कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है! उन्हें इस घोड़े से प्रेम था, इसे देखकर उनका मुख फूल की नाई खिल जाता था। कहते थे, “इसके बिना मैं रह न सकूँगा।” इसकी रखवाली में वे कई रात सोए नहीं। भजन-भक्ति न कर रखवाली करते रहे। परंतु आज उनके मुख पर दुःख की रेखा तक दिखाई न पड़ती थी। उन्हें केवल यह ख़याल था कि कहीं लोग ग़रीबों पर विश्वास करना न छोड़ दें। उन्होंने अपनी निज की हानि को मनुषयत्व की हानि पर न्योछावर कर दिया। ऐसा मनुष्य, मनुष्य नहीं देवता है।



रात्रि के अंधकार में दामोदर सिंह बाबा भानु के मंदिर पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था। आकाश पर तारे टिमटिमा रहे थे। थोड़ी दूर पर गाँवों के कुत्ते भौंक रहे थे। मंदिर के अंदर कोई शब्द सुनाई न देता था। दामोदर सिंह सुलतान की बाग पकड़े हुए था। वह धीरे-धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुँचा। फाटक किसी वियोगी की आँखों की तरह चौपट खुला था। किसी समय वहाँ बाबा भानु स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे, परंतु आज उन्हें किसी चोरी, किसी डाके का भय न था। हानि ने उन्हें हानि की तरफ़ से बे-परवाह कर दिया था। दामोदर सिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया। इस समय उसकी आँखों में नेकी के आँसू थे।

अंधकार में रात्रि ने तीसरा पहर समाप्त किया, और चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भानु ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया। उसके पश्चात्, इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो, उनके पाँव अस्तबल की ओर मुड़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई। साथ ही घोर निराशा ने पाँवों को मन-मन-भर का भारी बना दिया। वे वहीं रुक गए।



घोड़े ने स्वाभाविक मेघा से अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और ज़ोर से हिनहिनाया।

बाबा भानु  दौड़ते हुए अंदर घुसे, और अपने घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे, जैसे बिछुड़ा हुआ पिता चिरकाल के पश्चात् पुत्र से मिलकर रोता है। बार-बार उसकी पीठ पर हाथ फेरते, बार-बार उसके मुँह पर थपकियाँ देते और कहते थे “अब कोई ग़रीबों की सहायता से मुँह न मोड़ेगा।”


थोड़ी देर के बाद जब वह अस्तबल से बाहर निकले, तो उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। ये आँसू उसी भूमि पर ठीक उसी जगह गिर रहे थे, जहाँ बाहर निकलने के बाद दामोदर सिंह  खड़ा रोया था।

दोनों के आँसुओं का उसी भूमि की मिट्टी पर परस्पर मिलाप हो गया।


Wednesday, January 7, 2026

कफ़न में दफ़न, मस्ती में जग

एक झोंपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए थे और अंदर बेटे की जवान बीवी बिमला प्रसव-वेदना में चीख रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अंधकार में लय हो गया था। बिरजू ने कहा—“मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते हो गया, जा देख तो आ।”


राजेश चिढ़कर बोला—”मरना ही है तो जल्दी मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूँ?”

“तू बड़ा बेदर्द है बे! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफ़ाई!”



“तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।”

बनवाशी का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। बिरजू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। राजेश इतना कामचोर था कि आध घंटे काम करता तो घंटे भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कहीं मज़दूरी नहीं मिलती थी। घर में मुठ्ठी-भर भी अनाज मौजूद हो, तो उनके लिए काम करने की क़सम थी। जब दो-चार फ़ाक़े हो जाते तो बिरजू पेड़ पर चढ़कर लकड़ियाँ तोड़ लाता और राजेश बाज़ार से बेच लाता और जब तक वह पैसे रहते, दोनों इधर-उधर मारे-मारे फिरते। गाँव में काम की कमी न थी। 

किसानों का गाँव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे। मगर इन दोनों को उसी वक़्त बुलाते, जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी संतोष कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता। अगर दोनो साधु होते, तो उन्हें संतोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की बिलकुल ज़रूरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी। विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा कोई संपत्ति नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढाँके हुए जिए जाते थे। संसार की चिंताओं से मुक्त! क़र्ज़ से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई ग़म नहीं। दीन इतने कि वसूली की बिलकुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ क़र्ज़ दे देते थे। 

मटर, आलू की फ़सल में दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भानकर खा लेते या दस-पाँच ऊख उखाड़ लाते और रात को चूसते। बिरजू ने इसी आकाश-वृत्ति से साठ साल की उम्र काट दी और राजेश भी सपूत बेटे की तरह बाप ही के पद-चिह्नों पर चल रहा था, बल्कि उसका नाम और भी उजागर कर रहा था। इस वक़्त भी दोनों अलाव के सामने बैठकर आलू भून रहे थे, जो कि किसी खेत से खोद लाए थे। बिरजू की स्त्री का तो बहुत दिन हुए, देहांत हो गया था। राजेश का ब्याह पिछले साल हुआ था। जब से यह औरत आई थी, उसने इस ख़ानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनों बे-ग़ैरतों का दोज़ख़ भरती रहती थी। जब से वह आई, यह दोनों और भी आलसी और आरामतलब हो गए थे। बल्कि कुछ अकड़ने भी लगे थे। कोई कार्य करने को बुलाता, तो निर्ब्याज भाव से दुगुनी मज़दूरी माँगते। वही औरत आज प्रसव-वेदना से मर रही थी और यह दोनों इसी इंतज़ार में थे कि वह मर जाए, तो आराम से सोएँ।


बिरजू ने आलू निकालकर छीलते हुए कहा—“जाकर देख तो, क्या दशा है उसकी? चुड़ैल का फिसाद होगा, और क्या? यहाँ तो ओझा भी एक रुपया माँगता है!”

राजेश को भय था, कि वह कोठरी में गया, तो बिरजू आलुओं का बड़ा भाग साफ़ कर देगा। बोला- “मुझे वहाँ जाते डर लगता है।”


“डर किस बात का है, मैं तो यहाँ हूँ ही।”

“तो तुम्हीं जाकर देखो न?”


“मेरी औरत जब मरी थी, तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नहीं था! और फिर मुझसे लजाएगी कि नहीं? जिसका कभी मुँह नहीं देखा, आज उसका उघड़ा हुआ बदन देखूँ! उसे तन की सुध भी तो न होगी? मुझे देख लेगी तो खुलकर हाथ-पाँव भी न पटक सकेगी!”

“मैं सोचता हूँ कोई बाल-बच्चा हो गया तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में!”


“सब कुछ आ जाएगा। भगवान दें तो! जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वे ही कल बुलाकर रुपए देंगे। मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ न था, मगर भगवान ने किसी-न-किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।”

जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुक़ाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज़्यादा संपन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी। हम तो कहेंगे, बिरजू किसानों से कहीं ज़्यादा विचारवान था और किसानों के विचार-शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाज़ों की कुत्सित मंडली में जा मिला था। हाँ, उसमें यह शक्ति न थी, कि बैठकबाज़ों के नियम और नीति का पालन करता। इसलिए जहाँ उसकी मंडली के और लोग गाँव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव उँगली उठाता था। फिर भी उसे यह तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम-से-कम उसे किसानों की-सी जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फ़ायदा तो नहीं उठाते!


दोनों आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ नहीं खाया था। इतना सब्र न था कि ठंडा हो जाने दें। कई बार दोनों की ज़बानें जल गईं। छिल जाने पर आलू का बाहरी हिस्सा ज़बान, हलक और तालू को जला देता था और उस अंगारे को मुँह में रखने से ज़्यादा ख़ैरियत इसी में थी कि वह अंदर पहुँच जाए। वहाँ उसे ठंडा करने के लिए काफ़ी सामान थे। इसलिए दोनों जल्द-जल्द निगल जाते। हालाँकि इस कोशिश में उनकी आँखों से आँसू निकल आते।

बिरजू को उस वक़्त ठाकुर की बरात याद आई, जिसमें बीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वह उसके जीवन में एक याद रखने लायक़ बात थी, और आज भी उसकी याद ताज़ा थी, बोला—“वह भोज नहीं भूलता। तब से फिर उस तरह का खाना और भरपेट नहीं मिला। लड़की वालों ने सबको भर पेट पूरियाँ खिलाई थीं, सबको! छोटे-बड़े सबने पूरियाँ खाईं और असली घी की! चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई, अब क्या बताऊँ कि उस भोज में क्या स्वाद मिला। कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज़ चाहो, माँगो, जितना चाहो खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पिया गया। मगर परोसने वाले हैं कि पत्तल में गर्म-गर्म, गोल-गोल सुवासित कचौरियाँ डाल देते हैं। मना करते हैं कि नहीं चाहिए, पत्तल पर हाथ रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिए जाते हैं। और जब सबने मुँह धो लिया, तो पान-इलायची भी मिली। मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुध थी? खड़ा हुआ न जाता था। चटपट जाकर अपने कंबल पर लेट गया। ऐसा दिल-दरियाव था वह ठाकुर!”




राजेश ने इन पदार्थों का मन-ही-मन मज़ा लेते हुए कहा—“अब हमें कोई ऐसा भोज नहीं खिलाता।”

“अब कोई क्या खिलाएगा? वह ज़माना दूसरा था। अब तो सबको किफ़ायत सूझती है। शादी-ब्याह में मत ख़र्च करो, क्रिया-कर्म में मत ख़र्च करो। पूछो, ग़रीबों का माल बटोर-बटोरकर कहाँ रखोगे? बटोरने में तो कमी नहीं है। हाँ, ख़र्च में किफ़ायत सूझती है!”


“तुमने एक बीस पूरियाँ खाई होंगी?”

“बीस से ज़ियादा खाई थीं!”


“मैं पचास खा जाता!”

“पचास से कम मैंने न खाई होंगी। अच्छा पका था। तू तो मेरा आधा भी नहीं है।”


आलू खाकर दोनों ने पानी पिया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़कर पाँव पेट में डाले सो रहे। जैसे दो बड़े-बड़े अजगर गेंडुलियाँ मारे पड़े हों। और बुधिया अभी तक कराह रही थी।

दो


सवेरे राजेश ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी स्त्री ठंडी हो गई थी। उसके मुँह पर मक्खियाँ भिनक रही थीं। पथराई हुई आँखें ऊपर टँगी हुई थीं। सारी देह धूल से लथपथ हो रही थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था।

राजेश भागा हुआ बिरजू के पास आया। फिर दोनों ज़ोर-ज़ोर से हाय-हाय करने और छाती पीटने लगे। पड़ोस वालों ने यह रोना-धोना सुना, तो दौड़े हुए आए और पुरानी मर्यादा के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे।


मगर ज़्यादा रोने-पीटने का अवसर न था। कफ़न की और लकड़ी की फ़िक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह ग़ायब था, जैसे चील के घोंसले में माँस?


बाप-बेटे रोते हुए गाँव के ज़मींदार के पास गए। वह इन दोनों की सूरत से नफ़रत करते थे। कई बार इन्हें अपने हाथों से पीट चुके थे। चोरी करने के लिए, वादे पर काम पर न आने के लिए। पूछा—“क्या है बे बिरजूआ, रोता क्यों है? अब तो तू कहीं दिखलाई भी नहीं देता! मालूम होता है, इस गाँव में रहना नहीं चाहता।”


बिरजू ने ज़मीन पर सिर रखकर आँखों में आँसू भरे हुए कहा—“सरकार! बड़ी विपत्ति में हूँ। राजेश की घरवाली रात को गुज़र गई। रात-भर तड़पती रही सरकार! हम दोनों उसके सिरहाने बैठे रहे। दवा-दारू जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, मुदा वह हमें दग़ा दे गई। अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रहा मालिक! तबाह हो गए। घर उजड़ गया। आपका ग़ुलाम हूँ, अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगाएगा। हमारे हाथ में तो जो कुछ था, वह सब तो दवा-दारू में उठ गया। सरकार ही की दया होगी, तो उसकी मिट्टी उठेगी। आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊँ।”

ज़मींदार साहब दयालु थे। मगर बिरजू पर दया करना काले कंबल पर रंग चढ़ाना था। जी में तो आया, कह दें, चल, दूर हो यहाँ से। यूँ तो बुलाने से भी नहीं आता, आज जब ग़रज़ पड़ी तो आकर ख़ुशामद कर रहा है। हरामख़ोर कहीं का, बदमाश! लेकिन यह क्रोध या दंड देने का अवसर न था।


जी में कुढ़ते हुए दो रुपए निकालकर फेंक दिए। मगर सांत्वना का एक शब्द भी मुँह से न निकला। उसकी तरफ़ ताका तक नहीं। जैसे सिर का बोझ उतारा हो।

जब ज़मींदार साहब ने दो रुपए दिए, तो गाँव के बनिए-महाजनों को इनकार का साहस कैसे होता? बिरजू ज़मींदार के नाम का ढिंढोरा भी पीटना ख़ूब जानता था। किसी ने दो आने दिए, किसी ने चारे आने। एक घंटे में बिरजू के पास पाँच रुपए की अच्छी रक़म जमा हो गई। कहीं से अनाज मिल गया, कहीं से लकड़ी। और दोपहर को बिरजू और राजेश बाज़ार से कफ़न लाने चले। इधर लोग बाँस-वाँस काटने लगे।


गाँव की नर्म दिल स्त्रियाँ आ-आकर लाश देखती थीं और उसकी बेकसी पर दो बूँद आँसू गिराकर चली जाती थीं।

तीन


बाज़ार में पहुँचकर बिरजू बोला—“लकड़ी तो उसे जलाने-भर को मिल गई है, क्यों राजेश!”

राजेश बोला—“हाँ, लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिए।”


“तो चलो, कोई हलक़ा-सा कफ़न ले लें।”

“हाँ, और क्या! लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफ़न कौन देखता है?”


“कैसा बुरा रिवाज़ है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए।”

“कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है।”


“और क्या रखा रहता है? यही पाँच रुपए पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारू कर लेते।”

दोनों एक-दूसरे के मन की बात ताड़ रहे थे। बाज़ार में इधर-उधर घूमते रहे। कभी इस बाज़ार की दूकान पर गए, कभी उसकी दूकान पर! तरह-तरह के कपड़े, रेशमी और सूती देखे, मगर कुछ जँचा नहीं। यहाँ तक कि शाम हो गई। तब दोनों न जाने किस दैवी प्रेरणा से एक मधुशाला के सामने जा पहुँचे। और जैसे किसी पूर्व निश्चित व्यवस्था से अंदर चले गए। वहाँ ज़रा देर तक दोनों असमंजस में खड़े रहे। फिर बिरजू ने गद्दी के सामने जाकर कहा—“साहूजी, एक बोतल हमें भी देना।”


इसके बाद कुछ चिखौना आया, तली हुई मछली आईं और दोनों बरामदे में बैठकर शांतिपूर्वक पीने लगे।



कई कुज्जियाँ ताबड़तोड़ पीने के बाद दोनों सरूर में आ गए। बिरजू बोला—“कफ़न लगाने से क्या मिलता? आख़िर जल ही तो जाता। कुछ बहू के साथ तो न जाता।”


राजेश आसमान की तरफ़ देखकर बोला, मानों देवताओं को अपनी निष्पापता का साक्षी बना रहा हो—“दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग बामनों को हज़ारों रुपए क्यों दे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं!”

“बड़े आदमियों के पास धन है, फूँके। हमारे पास फूँकने को क्या है?”


“लेकिन लोगों को जवाब क्या दोगे? लोग पूछेंगे नहीं, कफ़न कहाँ है?”

बिरजू हँसा—“अबे, कह देंगे कि रुपए कमर से खिसक गए। बहुत ढूँढ़ा, मिले नहीं। लोगों को विश्वास न आएगा, लेकिन फिर वही रुपए देंगे।”


राजेश भी हँसा, इस अनपेक्षित सौभाग्य पर बोला—“बड़ी अच्छी थी बेचारी! मरी तो ख़ूब खिला-पिलाकर!”

आधी बोतल से ज़्यादा उड़ गई। बिरजू ने दो सेर पूरियाँ मँगाई। चटनी, अचार, कलेजियाँ। शराबख़ाने के सामने ही दूकान थी। राजेश लपककर दो पत्तलों में सारे सामान ले आया। पूरा डेढ़ रुपया ख़र्च हो गया। सिर्फ़ थोड़े से पैसे बच रहे।


दोनों इस वक़्त इस शान में बैठे पूरियाँ खा रहे थे जैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ा रहा हो। न जवाबदेही का ख़ौफ़ था, न बदनामी की फ़िक्र। इन भावनाओं को उन्होंने बहुत पहले ही जीत लिया था।

बिरजू दार्शनिक भाव से बोला—“हमारी आत्मा प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुन्न न होगा?”


राजेश ने श्रद्धा से सिर झुकाकर तसदीक़ की—“ज़रूर से ज़रूर होगा। भगवान, तुम अंतर्यामी हो। उसे बैकुंठ ले जाना। हम दोनों हृदय से आशीर्वाद दे रहे हैं। आज जो भोजन मिला वह कभी उम्र-भर न मिला था।”

एक क्षण के बाद राजेश के मन में एक शंका जागी। बोला—“क्यों दादा, हम लोग भी एक-न-एक दिन वहाँ जाएँगे ही?”


बिरजू ने इस भोले-भाले सवाल का कुछ उत्तर न दिया। वह परलोक की बातें सोचकर इस आनंद में बाधा न डालना चाहता था।

“जो वहाँ वह हम लोगों से पूछे कि तुमने हमें कफ़न क्यों नहीं दिया तो क्या कहोगे?”


“कहेंगे तुम्हारा सिर!”

“पूछेगी तो ज़रूर!”


“तू कैसे जानता है कि उसे कफ़न न मिलेगा? तू मुझे ऐसा गधा समझता है? साठ साल क्या दुनिया में घास खोदता रहा हूँ? उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा!”

राजेश को विश्वास न आया। बोला—“कौन देगा? रुपए तो तुमने चट कर दिए। वह तो मुझसे पूछेगी। उसकी माँग में तो सेंदुर मैंने डाला था।”


“कौन देगा, बताते क्यों नहीं?”

“वही लोग देंगे, जिन्होंने अबकी दिया। हाँ, अबकी रुपए हमारे हाथ न आएँगे।”


ज्यों-ज्यों अँधेरा बढ़ता था और सितारों की चमक तेज़ होती थी, मधुशाला की रौनक भी बढ़ती जाती थी। कोई गाता था, कोई डींग मारता था, कोई अपने संगी के गले लिपटा जाता था। कोई अपने दोस्त के मुँह में कुल्हड़ लगाए देता था।

वहाँ के वातावरण में सुरूर था, हवा में नशा। कितने तो यहाँ आकर एक चुल्लू में मस्त हो जाते थे। शराब से ज़्यादा यहाँ की हवा उन पर नशा करती थी। जीवन की बाधाएँ यहाँ खींच लाती थीं और कुछ देर के लिए यह भूल जाते थे कि वे जीते हैं या मरते हैं। या न जीते हैं, न मरते हैं।


और यह दोनों बाप-बेटे अब भी मज़े ले-लेकर चुसकियाँ ले रहे थे। सबकी निगाहें इनकी ओर जमी हुई थीं। दोनों कितने भाग्य के बली हैं! पूरी बोतल बीच में है।

भरपेट खाकर राजेश ने बची हुई पूरियों का पत्तल उठाकर एक भिखारी को दे दिया, जो खड़ा इनकी ओर भूखी आँखों से देख रहा था। और देने के गौरव, आनंद और उल्लास का अपने जीवन में पहली बार अनुभव किया।


बिरजू ने कहा—“ले जा, ख़ूब खा और आशीर्वाद दे! जिसकी कमाई है, वह तो मर गई। मगर तेरा आशीर्वाद उसे ज़रूर पहुँचेगा। रोएँ-रोएँ से आशीर्वाद दो, बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे हैं!”

राजेश ने फिर आसमान की तरफ़ देखकर कहा—“वह बैकुंठ में जाएगी दादा, बैकुंठ की रानी बनेगी।”


बिरजू खड़ा हो गया और जैसे उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला—“हाँ, बेटा बैकुंठ में जाएगी। किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं। मरते-मरते हमारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गई। वह न बैकुंठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो ग़रीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चढ़ाते हैं?

श्रद्धालुता का यह रंग तुरंत ही बदल गया। अस्थिरता नशे की ख़ासियत है। दु:ख और निराशा का दौरा हुआ।


राजेश बोला—“मगर दादा, बेचारी ने ज़िंदगी में बड़ा दुख भोगा। कितना दुख झेलकर मरी!”

वह आँखों पर हाथ रखकर रोने लगा। चीखें मार-मारकर।


बिरजू ने समझाया—“क्यों रोता है बेटा, ख़ुश हो कि वह माया-जाल से मुक्त हो गई, जंजाल से छूट गई। बड़ी भाग्यवान थी, जो इतनी जल्द माया-मोह के बंधन तोड़ दिए।

और दोनों खड़े होकर गाने लगे—


“ठगिनी क्यों नैना झमकावे! ठगिनी!”

पियक्कड़ों की आँखें इनकी ओर लगी हुई थीं और यह दोनों अपने दिल में मस्त गाए जाते थे। फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी। गिरे भी, मटके भी। भाव भी बनाए, अभिनय भी किए। और आख़िर नशे में मदमस्त होकर वहीं गिर पड़े।


Tuesday, November 11, 2025

सुनवाई से ठीक एक रात पहले

तलाक की सुनवाई से ठीक एक रात पहले, मैंने अपने पति को बिस्तर पर बुलाया , उसे वो चीज़ दिखाई जिससे उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। सिर्फ़ 30 मिनट बाद वह मेरे सामने घुटनों पर गिरकर वापस आने की भीख माँग रहा था लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।



मेरा नाम अनन्या मेहता है और यह कहानी है मेरे छह साल के विवाह,मेरे टूटने, मेरे उठ खड़े होने और मेरे “स्वतंत्र” हो चुके पति अर्जुन की सबसे बड़ी हार की।

मेरी और अर्जुन कपूर की शादी कभी सबकी ईर्ष्या थी।वह दिल्ली का एक प्रतिभाशाली आर्किटेक्ट था और मैं इंटीरियर डिज़ाइनिंग की दीवानी।हमारा प्यार कॉलेज के दिनों में शुरू हुआ था।अर्जुन मेरी उँगली पकड़कर कनॉट प्लेस की सड़कों पर घूमता और ऊँची इमारतों की तरफ इशारा करके कहता—

"एक दिन मैं अपना घर खुद डिज़ाइन करूँगा और उसमें जान तुम डालोगी" और उसने ऐसा किया भी।

हमें दक्षिण दिल्ली में एक छोटा पर खूबसूरत घर मिला।वह अक्सर कहता-“तुम बस मुस्कुराती रहना बाकी दुनिया मुझ पर छोड़ दो।” मैंने उस पर यकीन किया।अपना सपना "खुद का ब्रांड खोलने का" दराज़ में बंद कर दिया। सोचा,परिवार सबसे पहले लेकिन समय,वही सबसे बड़ा सच दिखाता है।

अर्जुन बदलने लगा,धीरे,ख़तरनाक तरीके से।रातें देर तक बाहर रहना,अजीब बहाने,ठंडी बातें और एक दिन… उसकी शर्ट पर एक ऐसी खुशबू मिली जो न मेरी थी और ना उसके दफ़्तर वाली किसी महिला की। उसका फोन हमेशा उल्टा रखा होता।



कोई मैसेज आए तो वह बालकनी में जाकर फुसफुसाते हुए बात करता।

एक रात उसका फोन मेज़ पर बजा।मैंने देखने की कोशिश भी नहीं की लेकिन स्क्रीन पर चमका नाम:-“रूही रेडलिप्स” और नीचे सिर्फ़ दो शब्द:-“मिस यू।”

जब मैंने उससे पूछा तो अर्जुन हँस पड़ा।एक ऐसी हँसी जो किसी भी स्त्री का दिल तोड़ देती है। तुम हमेशा ओवरथिंक करती हो। बस एक को-ऑर्डिनेटर है। ऑफिस में मज़ाक में निकनेम रखे हुए हैं।” 

मैंने चाहा कि मैं उस पर भरोसा करूँ लेकिन विश्वास भी टूटता है,एक बार, बस एक बार। वह मुझे “पुरानी”, “बोरिंग”, “गृहिणी वाली” कहने लगा।कहता-“ज़रा आधुनिक बनो, तुम बिल्कुल गाँव की औरत लगती हो।”

मैंने आईने में देखा।थकी हुई आँखें,बिखरे बाल,सादी साड़ी🥱हाँ, मैं बदल गई थी लेकिन उसके लिए, उसके घर,उसके सुख के लिए और फिर एक शाम,जब मैंने उसकी पसंदीदा राजस्थानी दाल बाटी बनाकर मेज़ पर रखी तो अर्जुन ने चम्मच नीचे रख दिया और ठंडी आवाज़ में बोला:- “मैं तलाक चाहता हूँ।”

मेरे हाथ काँप गए लेकिन मैंने आँसू नहीं बहाए🥱

उसने झुँझलाकर कहा:-“हम अब एक दूसरे के लिए नहीं बने हैं। मुझे आज़ादी चाहिए,वही आज़ादी जिसके लिए वह “रूही” के पास जाना चाहता था।

वह घर छोड़कर चला गया और उसी रात मैंने निर्णय कर लिया मैं रोकर अपने चेहरे पर दया नहीं पेंट करूँगी,मैं अपना साम्राज्य खड़ा करूँगी।

अर्जुन सोचता रहा कि मैं टूटी हुई,उदास,घर में सिमटी औरत हूं😎उसे क्या पता था—जब वह “क्लाइंट मीटिंग” के नाम पर डेट्स पर जा रहा था,मैं दिल्ली के सबसे बड़े फर्नीचर हब, किरीड़ी नगर,में सप्लायर्स से मिल रही थी। जब वह देर रात “ओवरटाइम” कर रहा था,मैं ऑनलाइन एमबीए का कोर्स कर रही थी। जब वह मुझे कहता कि मैं “कुछ नहीं कर सकती”—

मैं करोड़ों का कॉन्ट्रैक्ट साइन कर रही थी💪

छह महीने तक मैंने दिन रात खून पसीना लगाया और खड़ा किया—A.M. Interiors — Ananya Mehta Interiors Pvt Ltd.(मेरे नाम का पहला अक्षर,मेरी पहचान)

मैंने अपना ऑफिस लिया, टीम बनाई, प्रोजेक्ट्स जीते,यहाँ तक कि एक इंटरनेशनल होम-डेकोर ब्रांड से भी कॉन्ट्रैक्ट कर लिया।

और अर्जुन?

उसे लगा कि मैं अभी भी वही “सिंपल गृहिणी” हूं,तलाक से एक रात पहले,घर बिल्कुल ख़ामोश था। मैं नीचे आई और कहा:-अर्जुन,ऊपर चलो,मुझे कुछ दिखाना है।

वह थका हुआ और चिढ़ा हुआ बोला:-ड्रामा मत करो,अनन्या, सुबह कोर्ट जाना है लेकिन फिर भी मेरे पीछे आ गया।

मैंने लाइट धीमी की,लैपटॉप को टीवी स्क्रीन से जोड़ा और प्ले किया…

एक शानदार, प्रोफेशनल विज्ञापन।

लक्ज़री फ़्लैट्स,खूबसूरत इंटीरियर,परफेक्ट लाइटिंग,उत्तम प्लानिंग…

अर्जुन धीरे धीरे स्क्रीन के पास झुक गया। फिर उसके चेहरे पर हैरानी फैलने लगी🥱

विज्ञापन खत्म हुआ और उसके बाद स्क्रीन पर आया—A.M. Interiors – Designed by Ananya Mehta (Founder & CEO)और फिर मेरे ही फुटेज:

मैं टीम को निर्देश दे रही थी,मीटिंग्स ले रही थी,ब्लूप्रिंट्स approve कर रही थी।एक आत्मविश्वासी,स्टाइलिश,सफल महिला।

अर्जुन के मुँह से आवाज़ ही नहीं निकली🥱

आखिर उसने काँपते स्वर में पूछा:-“ये… सब तुम्हारा है?”

मैंने शांत हँसी के साथ कहा:- हाँ,अर्जुन,छह महीने तुम्हारी ‘आज़ादी’ के छह महीने…मैंने अपनी दुनिया बना ली।” और फिर आख़िरी वार—

रूही जिस कंपनी में इंटरव्यू दे रही है?

वही कंपनी है जिसे मैंने अभी अभी बड़ा कॉन्ट्रैक्ट हराकर हरा दिया।”

अर्जुन के चेहरे से रंग उड़ गया🥱वह मुझे घूरता रहा, जैसे मुझे पहली बार देख रहा हो।

फिर…

वह मेरे सामने घुटनों पर बैठ गया,बोला:-अनन्या,मैं गलत था।

कृपया हमें एक मौका दो। मैं तुम्हें खो नहीं सकता,मैंने उसका चेहरा देखा। पहली बार वह सच में टूटा हुआ दिख रहा था लेकिन मेरा दिल शांत था, बिना किसी आँसू के।

मैंने उसके हाथ हटाए और धीरे से कहा:-अर्जुन,तुमने आज़ादी माँगी थी,अब… उसे जिओ।

अगली सुबह,मैंने ताज होटल के सामने स्थित दिल्ली फ़ैमिली कोर्ट से एक मुस्कान के साथ बाहर कदम रखा। काग़ज़ों पर सिर्फ़ एक हस्ताक्षर था लेकिन मेरे भीतर एक पूरी दुनिया खुल चुकी थी।

पीछे,अर्जुन खड़ा था,आँखों में पछतावा,हाथों में खालीपन। मैंने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

नया सूरज,नई हवा,नई अनन्या।

मैं अब सिर्फ़ उसकी “गृहिणी” नहीं थी।मैं थी—CEO. Founder.और सबसे बड़ी बात,आज़ाद💪

कभी कभी,स्त्रियाँ बदला नहीं लेतीं।वे बस और बेहतर बन जाती हैं और वही—सबसे कीमती जवाब होता है

उस समय इतनी समझ भी नही थी

 गाँव में कॉलेज नही था इस कारण पढ़ने के लिए मै शहर आया था । यह किसी रिश्तेदार का एक कमरे का मकान था।



बिना किराए का था।


आस-पास सब गरीब लोगो के घर थे।


और में अकेला था सब काम मुजे खुद ही करने पड़ते थे। खाना-बनाना, कपड़े धोना, घर की साफ़-सफाई करना।


कुछ दिन बाद एक गरीब लडकी अपने छोटे भाई के साथ मेरे घर पर आई।



आते ही सवाल किया:-" तुम मेरे भाई को ट्यूशन करा सकते हो क्या ?"


मेंने कुछ देर सोचा फीर कहा "नही"


उसने कहा "क्यूँ?


मेने कहा "टाइम नही है। मेरी पढ़ाई डिस्टर्ब होगी।"


उसने कहा "बदले में मैं तुम्हारा खाना बना दूँगी।"


शायद उसे पता था की में खाना खुद पकाता हुँ


मैंने कोई जवाब नही दिया तो वह और लालच दे कर बोली:-बर्तन भी साफ़ कर दूंगी।"


अब मुझे भी लालच आ ही गया: मेने कहा-"कपड़े भी धो दो तो पढ़ा दूँगा।"


वो मान गई।


इस तरह से उसका रोज घर में आना-जाना होने लगा।


वो काम करती रहती और मैं उसके भाई को पढ़ा रहा होता। ज्यादा बात नही होती। उसका भाई 8वीं कक्षा में था। खूब होशियार था। इस कारण ज्यादा माथा-पच्ची नही करनी पड़ती थी। कभी-कभी वह घर की सफाई भी कर दिया करती थी।


दिन गुजरने लगे। एक रोज शाम को वो मेरे घर आई तो उसके हाथ में एक बड़ी सी कुल्फी थी।


मुझे दी तो मैंने पूछ लिया:-" कहाँ से लाई हो'?


उसने कहा "घर से।


आज बरसात हो गई तो कुल्फियां नही बिकी।"


इतना कह कर वह उदास हो गई।


मैंने फिर कहा:-" मग़र तुम्हारे पापा तो समोसे-कचोरी का ठेला लगाते हैं?


उसने कहा- वो:-" सर्दियों में समोसे-कचोरी और गर्मियों में कुल्फी।"


और:- आज"बरसात हो गई तो कुल्फी नही बिकी मतलब " ठण्ड के कारण लोग कुल्फी नही खाते।"


"ओह" मैंने गहरी साँस छोड़ी।


मैंने आज उसे गौर से देखा था। गम्भीर मुद्रा में वो उम्र से बडी लगी। समझदार भी, मासूम भी।


धीरे-धीरे वक़्त गुजरने लगा।


मैं कभी-कभार उसके घर भी जाने लगा। विशेषतौर पर किसी त्यौहार या उत्सव पर। कई बार उससे नजरें मिलती तो मिली ही रह जाती। पता नही क्यूँ?


एसे ही समय बीतता गया इस बीस


कुछ बातें मैंने उसकी भी जानली। की वो ; बूंदी बाँधने का काम करती है। बूंदी मतलब किसी ओढ़नी या चुनरी पर धागे से गोल-गोल बिंदु बनाना। बिंदु बनाने के बाद चुनरी की रंगाई करने पर डिजाइन तैयार हो जाती है।


मैंने बूंदी बाँधने का काम करते उसे बहुत बार देखा था।


एक दिन मेंने उसे पूछ लिया:-" ये काम तुम क्यूँ करती हो?"


वह बोली:-"पैसे मिलते हैं।"


"क्या करोगी पैसों का?"


"इकठ्ठे करती हूँ।"


"कितने हो गए?"


"यही कोई छः-सात हजार।"


"मुझे हजार रुपये उधार चाहिए।


जल्दी लौटा दूंगा।" मैंने मांग लिए।


उसने सवाल किया:-"किस लिए चाहिए?"


"कारण पूछोगी तो रहने दो।" मैंने मायूसी के साथ कहा।


वो बोली अरे मेंने तो "ऐसे ही पूछ लिया। तू माँगे तो सारे दे दूँ।" उसकी ये आवाज़ अलग सी जान पड़ी। मग़र मैं उस वक़्त कुछ समझ नही पाया। पैसे मिल रहे थे उन्ही में खोकर रह गया। एक दोस्त से उदार लिए थे । कमबख्त दो -तीन बार माँग चूका था।


एक रोज मेरी जेब में गुलाब की टूटी पंखुड़ियाँ निकली। मग़र तब भी मैं यही सोच कर रह गया कि कॉलेज के किसी दोस्त ने चुपके से डाल दी होगी।


उस समय इतनी समझ भी नही थी।


एक दिन कॉलेज की मेरी एक दोस्त मेरे घर आई कुछ नोट्स लेने। मैंने दे दिए।


और वो मेरे घर के बाहर खडी थी और मेरी दोस्त को देखकर बाहर से ही तुरंत वापिस घर चली गई।


और फ़िर दूसरे दिन दो पहर में ही आ धमकी।


आते ही कहा:-" मैं कल से तुम्हारा कोई काम नही करूंगी।"


मैने कहा "क्यूँ?


काफी देर तो उसने जवाब नही दिया। फिर धोने के लिए मेरे बिखरे कपड़े समेटने लगी।


मैने कहा "कहीं जा रही हो?"


उसने कहा "नही। बस काम नही करूंगी।


और मेरे भाई को भी मत पढ़ाना कल से।"


मैने कहा अरे"तुम्हारे हजार रूपये कल दे दूंगा। कल घर से पैसे आ रहे हैं।" मुझे पैसे को लेकर शंका हुई थी।इस कारण पक्का आश्वासन दे दिया।


उसने कहो "पैसे नही चाहिए मुझे।"


मेने कहा "तो फिर ?"


मैने आँखे उसके चेहरे पर रखी और


उसने एक बार मुझसे नज़र मिलाई तो लगा हजारों प्रश्न है उसकी आँखों में। मग़र मेरी समझ से बाहर थे।


उसने कोई जवाब नही दिया।


मेरे कपड़े लेकर चली गई।


अपने घर से ही धोकर लाया करती थी।


दूसरे दिन वह नही आई।


न उसका भाई आया।


मैंने जैसे-तैसे खाना बनाया। फिर खाकर कॉलेज चला गया। दोपहर को आया तो सीधा उसके घर चला गया। यह सोचकर की कारण तो जानू काम नही करने का।


उसके घर पहुंचा तो पता चला की वो बीमार है।


एक छप्पर में चारपाई पर लेटी थी अकेली। घर में उसकी मम्मी थी जो काम में लगी थी।


मैं उसके पास पहुंचा तो उसने मुँह फेर लिया करवट लेकर।


मैंने पूछा:-" दवाई ली क्या?"


"नही।" छोटा सा जवाब दिया बिना मेरी तरफ देखे।


मैने कहा "क्यों नही ली?


उसने कहा "मेरी मर्ज़ी। तुझे क्या?


"मुझसे नाराज़ क्यूँ हो ये तो बतादो।"


"तुम सब समझते जवाब दिया बिना मेरी तरफ देखे।


मैने कहा "क्यों नही ली?


उसने कहा "मेरी मर्ज़ी। तुझे क्या?


"मुझसे नाराज़ क्यूँ हो ये तो बतादो।"


"तुम सब समझते हो, फिर मैं क्यूँ बताऊँ।"


"कुछ नही पता। तुम्हारी कसम। सुबह से परेसान हूँ। बता दो।"


" नही बताउंगी। जाओ यहाँ से।" इस बार आवाज़ रोने की थी।


मुझे जरा घबराहट सी हुई। डरते-डरते उसके हाथ को छूकर देखा तो मैं उछल कर रह गया। बहुत गर्म था।


मैंने उसकी मम्मी को पास बुलाकर बताया।


फिर हम दोनों उसे हॉस्पिटल ले गए।


डॉक्टर ने दवा दी और एडमिट कर लिया।


कुछ जाँच वगेरह होनी थी।


क्यूंकि शहर में एक दो डेंगू के मामले आ चुके थे।


मुझे अब चिंता सी होने लगी थी।


उसकी माँ घर चली गई। उसके पापा को बुलाने।


मैं उसके पास अकेला था।


बुखार जरा कम हो गया था। वह गुमसुम सी लेटी थी। दीवार को घुर रही थी एकटक!!


मैंने उसके चैहरे को सहलाया तो उसकी आँखों में आँसू आ गए और मेरे भी।


मैंने भरे गले से पूछा:- "बताओगी नही?"


उसने आँखों में आँसू लिए मुस्कराकर कहा:-" अब बताने की जरूरत नही है। पता चल गया है कि तुझे मेरी परवाह है। है ना?"


मेरे होठों से अपने आप ही एक अल्फ़ाज़ निकला:-


" बहुत।"


उसने कहा "बस! अब में मर भी जाऊँ तो कोई गिला नही।" उसने मेरे हाथ को कस कर दबाते हुए कहा।


उसके इस वाक्य का कोई जवाब मेरे लबों से नही निकला। मग़र आँखे थी जो जवाब को संभाल न सकी। बरस पड़ी।


वह उठ कर बैठ गई और बोली रोता क्यूँ है पागल? मैने जिस दिन पहली बार तेरे लिए रोटी बनाई थी उसी दिन से चाहती हूँ तुझे। एक तू था पागल । कुछ समझने में इतना वक़्त ले गया।"


फिर उसने अपने साथ मेरे आँसू भी पोछे।


फीर थोडी देर बाद उसके घर वाले आ गए।


रात हो गई थी। उसकी हालत में कोई सुधार नही हुआ।


फिर देर रात तक उसकी बीमारी की रिपोर्ट आ गई।


बताया गया की उसे डेंगू है।


और ए जान कर आग सी लग गई मेरे सीने में।


खून की कमी हो गई थी उसे। पर खुदा का शुक्र है की मेरा खून मैच हो गया ब


था उसका भी। दो बोतल खून दिया मैंने तो जरा शकून सा मिला दिल को।


उस रात वह अचेत सी रही।


बार-बार अचेत अवस्था में उल्टियाँ कर देती थी।


मैं एक मिनिट भी नही सोया उस रात।


डॉक्टरों ने दूसरे दिन बताया कि रक्त में प्लेटलेट्स की संख्या तेजी से कम हो रही है। खून और देना होगा। डेंगू का वायरस खून का थक्का बनाने वाली प्लेटलेट्स पर हमला करता हैं । अगर प्लेटलेट्स खत्म तो पुरे शरीर के अंदरुनी अंगों से ख़ून का रिसाव शुरू हो जाता है। फिर बचने का कोई चांस नही।


मैंने अपना और खून देने का आग्रह किया मग़र रात को दिया था इस कारण डोक्टर ने मना कर दिया ।


फीर मैंने मेरे कॉलेज के दो चार दोस्तों को बुलाया। दस एक साथ आ गए। खून दिया। हिम्मत बंधाई। पैसों की जरूरत हो तो देने का आश्वासन दिया और चले गए। उस वक़्त पता चला दोस्त होना भी कितना जरूरी है। पैसों की कमी नही थी। घर से आ गए थे।


दूसरे दिन की रात को वो कुछ ठीक दिखी। बातें भी करने लगी।


रात को सब सोए थे। मैं उसके पास बैठा जाग रहा था।


उसने मुझे कहा:- " पागल बीमार मैं हूँ तू नही। फिर ऐसी हालत क्यों बनाली है तुमने?"


मैंने कहा:-" तू ठीक हो जा। मैं तो नहाते ही ठीक हो जाऊंगा।"


उसने उदास होकर पूछा ।:-" एक बात बता?"


मैने कहा"क्यां?"


उसने कहा "मैंने एक दिन तुम्हारी जेब में गुलाब डाला था तुझे मिला?


मैने कहा "सिर्फ पंखुड़ियाँ मिली थी "हाँ"


उसने कहा "कुछ समझे थे?"


"नही।"


"क्यूँ?"


"सोचा था कॉलेज के किसी दोस्त की मज़ाक है।"


"और वो रोटियाँ?"


"कौनसी?"


"दिल के आकार वाली।"


"अब समझ में आ रहा है।"


"बुद्दू हो"


"हाँ"


फिर वह हँसी। काफी देर तक। निश्छल मासूम हंसी।


"कल सोए थे क्या?"


"नही।"


"अब सो जाओ। मैं ठीक हूँ मुझे कुछ न होगा।"


सचमुच नींद आ रही थीं।


मग़र मैं सोया नही।


मग़र वह सो गई।


फिर घंटेभर बाद वापस जाग गई।


मैं ऊंघ रहा था।


"सुनो।"


"हाँ।मैं नींद में ही बोला।


"ये बताओ ये बीमारी छूने से किसी को लग सकती है क्या?"


"नही, सिर्फ एडीज मच्छर के काटने से लगती है।"


"इधर आओ।"


मैं उसके करीब आ गया।


"एक बार गले लग जाओ। अगर मर गई तो ये आरज़ू बाकी न रह जाए।"


"ऐसा ना कहो प्लीज।" मैं इतना ही कह पाया।


फिर वो मुझसे काफी देर तक लिपटी रही और सो गई।


फिर उसे ढंग से लिटाकर मैं भी एक खाली बेड पर सो गया।


मग़र सुबह मैं तो उठ गया। और वो नही उठी। सदा के लिए सो गई। मैंने उसे जगाने की बहुत कोशिश की थी।पर आँखे न खोली उसने।वो इस सँसार को मुझे छोडकर इस दुनिया से जा चुकी थी। मुझे रोता बिलखता छोड़कर।