Saturday, February 21, 2026

लगेगा साल का पहला पूर्ण चंद्र ग्रहण..


17 फरवरी को साल का पहला सूर्य ग्रहण लग चुका है और अब इसके बाद चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है. हालांकि, भारत में सूर्य ग्रहण नहीं दिखाई दिया था, जिसके कारण सूतक काल के नियम भी लागू नहीं हुए थे. पंचांग के अनुसार चंद्र ग्रहण होली पर लगने जा रहा है, साथ ही इस दिन फाल्गुन महीने की पूर्णिमा तिथि भी है. गौरतलब है कि, यह चंद्र ग्रहण भारत में भी दिखाई देगा और सूतक काल के नियम भी मान्य होंगे. इसी कड़ी में आइए जानते हैं, कि चंद्र ग्रहण कब से कब तक लगेगा और सूतक काल का समय क्या रहेगा.



कब लगेगा साल का पहला चंद्र ग्रहण?

साल का पहला चंद्र ग्रहण 3 मार्च को लगने जा रहा है. यह दोपहर 3 बजकर 20 मिनट से लेकर शाम को 6 बजकर 47 मिनट तक रहेगा और इसकी कुल अवधि 3 घंटे 27 मिनट की होगी. यह एक पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा, जो पूरे एशिया समेत ऑस्ट्रेलिया में भी नजर आएगा. आपकी जानकारी के लिए बता दें, कि पूर्ण चंद्र ग्रहण एक खगोलीय घटना है, जो तब होती है जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है और सूर्य की किरणें सीधे चंद्रमा तक नहीं पहुंच पातीं है. 

कब से होगा सूतक काल मान्य?

चंद्र ग्रहण का सूतक काल 9 घंटे पहले से मान्य होता है. ऐसे में 3 मार्च को लगने वाले चंद्र ग्रहण की सूतक काल की शुरुआत सुबह 6 बजकर 20 मिनट से होगी.


गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष सावधानियां
ग्रहण के दौरान गर्भवती महिलाओं को विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी गई है। ऐसी मान्यता है कि ग्रहण की छाया का सीधा असर गर्भ में पल रहे शिशु पर पड़ सकता है।



* ग्रहण के दौरान घर से बाहर न निकलें और न ही चांद को देखें

* नुकीली चीजों जैसे चाकू, कैंची या सुई का इस्तेमाल बिल्कुल न करें।



* ज्यादा से ज्यादा भगवान का ध्यान करें और धार्मिक ग्रंथों का पाठ करें।

* ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान जरूर करें ताकि नकारात्मकता दूर हो सके।


सूतक काल में क्या करें और क्या न करें?
सूतक काल और ग्रहण के समय भोजन करना, सोना, तेल मालिश करना और बाल काटना वर्जित माना गया है। हालांकि, बच्चे, बुजुर्ग और बीमार व्यक्ति इन नियमों में छूट ले सकते हैं। खाने-पीने की चीजों को दूषित होने से बचाने के लिए उनमें पहले से ही ‘तुलसी के पत्ते’ या ‘कुश’ डाल देना चाहिए। ग्रहण काल में मंत्रों का जाप करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है। ग्रहण समाप्त होने के बाद पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करें और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य अवश्य करें, जिससे ग्रहण के नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सके।


Friday, January 30, 2026

नाभि में रुई कहां से आती है ? यह बहुत गंभीर समस्या है


नाभि पर रुई आने के कारण

 नाभि में रूई आने का कारण "नाभि फ्लफ(Navel Fluff) नामक घटना है। वास्तव में यह रूई नहीं होती, बल्कि कपड़ों के रेशे होते हैं, जो नाभि में जमा हो जाता है। जब आप कपड़े पहनते हैं, या सोते हैं तो आपके कपड़ों या चादर के रेशे टूटकर नाभि में चले जाते हैं, ऐसा नाभि के आस-पास के बालों की वजह से होता है। रेशे बालों में फंसकर धीरे-धीरे नाभि में चले जाते हैं। जिसके शरीर में जितने अधिक बाल होते हैं, उसकी नाभि से उतना ज्यादा रूई निकलती है।

क्या नाभि की रुई से बदबू आती है?

अगर नाभि की रुई से बदबू आती है, तो ये नाभि में गंदगी जमा होने या किसी तरह के संक्रमण का संकेत हो सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, ह्यूमन नाभि में लगभग 70 तरह के बैक्टीरिया पाए जाते हैं। इसके अलावा नाभि में नमी, पसीना, तेल और डेड स्किन भी आसानी से जमा हो जाते हैं। ऐसे में अगर नियमित तौर पर नाभि की सही तरह से सफाई न की जाए, तो ये बैक्टीरिया गंदगी के साथ मिलकर बदबू पैदा कर सकते हैं।

नाभि में बार-बार रुई आने से कैसे बचें?

  • सके लिए रोज नहाते समय नाभि को हल्के साबुन और पानी से साफ करें.
  • नहाने के बाद नाभि को अच्छी तरह सुखाएं.
  • बहुत ज्यादा टाइट और ज्यादा रेशेदार कपड़ों से बचें.
  • ज्यादा बाल होने पर आप पेट के आसपास ट्रिमिंग कर सकते हैं.
  • साथ ही आप रात को सोते समय भी एक बार साफ कपड़े और पानी से नाभि की सफाई कर सकते हैं. 

इन छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रखकर आप न केवल रुई की समस्या से बच सकते हैं, बल्कि इससे नाभि में बैक्टीरिया या इंफेक्शन के खतरे को भी कम किया जा सकता है। लेकिन अगर इसके बाद भी नाभि से बदबू आए, डिस्चार्ज या दर्द हो, तो इसे नजरअंदाज न करें। इस कंडीशन में एक बार हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह लेना जरूरी।



घर में किए जाने वाले घरेलू उपाय

नाभि में लगातार रुई आ रही है या आप इससे बचना चाहते हैं तो रोज तेल डालें. तेल डालने के लिए आप तिल का तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं सर्दियों में सरसों का तेल इस्तेमाल किया जा सकता है आपको बहुत ही फायदा होगा और आप बीमारियों से भी बचे रहेंगे


Saturday, January 17, 2026

बाप रे बाप 320MP कैमरा और 7300mAh बैटरी के साथ OnePlus

वनप्लस का नया फ़ोन – 320MP कैमरा और 7300mAh बैटरी के साथ ₹9,600 में

OnePlus 12 Pro 5G (2026 एडिशन) के लॉन्च के साथ, कंपनी एक फ्लैगशिप डिवाइस क्या कर सकता है, इसकी सीमाओं को आगे बढ़ा रही है। अपने एडवांस्ड कैमरा सिस्टम से लेकर पावरफुल परफॉर्मेंस और रिफाइंड डिज़ाइन तक, OnePlus 12 Pro का लक्ष्य ग्लोबल स्मार्टफोन मार्केट में नए बेंचमार्क स्थापित करना है।



डिज़ाइन और बिल्ड क्वालिटी

OnePlus 12 Pro ब्रांड की एयरोस्पेस-ग्रेड एल्यूमीनियम चेसिस से बनी कर्व्ड ग्लास बॉडी है, जो इसे एलिगेंट और टिकाऊ बनाती है। बैक पैनल में मैट-फ्रॉस्टेड गोरिल्ला ग्लास 6 फिनिश का इस्तेमाल किया गया है जो फिंगरप्रिंट्स को रोकता है और एक स्मूथ प्रीमियम टच देता है।


कैमरा मॉड्यूल को एक सर्कुलर आइलैंड लेआउट में रीडिज़ाइन किया गया है, जो इसे एक अलग लेकिन बैलेंस्ड लुक देता है। वनप्लस इस फ्लैगशिप को तीन शानदार रंगों में पेश करता है — सेलेस्टियल ब्लैक, ग्लेशियर ब्लू और एमराल्ड ग्रीन — जिनमें से हर एक को रोशनी को अलग तरह से रिफ्लेक्ट करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।


सिर्फ़ 7.9 mm पतला और लगभग 195 ग्राम वज़न वाला OnePlus 12 Pro हाथ में स्लीक लेकिन सॉलिड महसूस होता है। इसमें IP68 रेटिंग भी है, जो धूल और पानी के छींटों से सुरक्षा सुनिश्चित करती है।



डिस्प्ले: एक विज़ुअल पावरहाउस

इस फ़ोन में 6.82-इंच का LTPO AMOLED डिस्प्ले है जिसमें QHD+ रिज़ॉल्यूशन (3216×1440 पिक्सल) और 120Hz एडैप्टिव रिफ्रेश रेट है। HDR10+ सपोर्ट और 1,800 निट्स की पीक ब्राइटनेस की वजह से, विज़ुअल्स शानदार हैं — चाहे आप 4K कंटेंट स्ट्रीम कर रहे हों, गेमिंग कर रहे हों, या सोशल मीडिया स्क्रॉल कर रहे हों।


वनप्लस ने कलर एक्यूरेसी और टच रिस्पॉन्स में सुधार किया है, जिससे डिस्प्ले अपनी क्लास में सबसे इमर्सिव में से एक बन गया है। कॉर्निंग गोरिल्ला ग्लास विक्टस 2 अचानक गिरने और खरोंच से अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करता है।


जो लोग बाहर कंटेंट देखते हैं, उनके लिए AI एडैप्टिव ब्राइटनेस फीचर आसपास की रोशनी के आधार पर रियल-टाइम में ब्राइटनेस और कंट्रास्ट को एडजस्ट करता है, जिससे हर समय साफ़ विज़िबिलिटी सुनिश्चित होती है। परफॉर्मेंस और हार्डवेयर

अंदर से, OnePlus 12 Pro क्वालकॉम स्नैपड्रैगन 8 जेन 3 चिपसेट से पावर्ड है, जो 4nm प्रोसेस पर बना है। यह प्रोसेसर, एड्रेनो 750 GPU के साथ मिलकर, मल्टीटास्किंग, गेमिंग और AI-बेस्ड कामों के लिए टॉप-टियर परफॉर्मेंस सुनिश्चित करता है।


यह डिवाइस 16GB तक LPDDR5X रैम और 512GB UFS 4.0 स्टोरेज के साथ आता है, जिससे ऐप्स बहुत तेज़ी से लॉन्च होते हैं और मल्टीटास्किंग बिना किसी रुकावट के होती है। चाहे आप 4K वीडियो एडिट कर रहे हों, ग्राफ़िक्स-इंटेंसिव गेम खेल रहे हों, या कई ऐप्स के बीच स्विच कर रहे हों, OnePlus 12 Pro इसे आसानी से हैंडल करता है।


सॉफ्टवेयर: OxygenOS 15 – प्योर, स्मूथ और इंटेलिजेंट

OxygenOS 15 (Android 14 पर आधारित) पर चलने वाला OnePlus 12 Pro वही साफ़ और फ्लूइड सॉफ्टवेयर अनुभव बनाए रखता है जो OnePlus यूज़र्स को पसंद है। इंटरफ़ेस बिना किसी फालतू चीज़ के है, जिसमें कम ब्लोटवेयर और स्मूथ एनिमेशन हैं।


नया वर्जन AI स्मार्टसीन रिकग्निशन पेश करता है, जो यूज़र के व्यवहार के आधार पर परफॉर्मेंस को ऑप्टिमाइज़ करता है, और स्मार्ट चार्जिंग AI, जो चार्जिंग पैटर्न को एडजस्ट करके बैटरी लाइफ़ बढ़ाने में मदद करता है।


कैमरा: इमेजिंग में एक बड़ी छलांग

OnePlus 12 Pro का कैमरा सिस्टम हैसलब्लैड के साथ मिलकर बनाया गया है, जो ब्रांड की हाई-क्वालिटी इमेजिंग की विरासत को जारी रखता है। ट्रिपल-कैमरा सेटअप में शामिल हैं:


50MP Sony IMX890 प्राइमरी सेंसर (OIS, f/1.8)

48MP अल्ट्रा-वाइड सेंसर (150° फील्ड ऑफ़ व्यू)

32MP टेलीफ़ोटो लेंस (3x ऑप्टिकल ज़ूम, OIS)

खींची गई तस्वीरें डिटेल वाली, रंग में सटीक और कम रोशनी की स्थिति में भी बैलेंस्ड होती हैं। AI नाइटस्केप मोड रात की फोटोग्राफी के दौरान क्लैरिटी में काफी सुधार करता है और नॉइज़ को कम करता है।


हैसलब्लैड प्रो मोड 2.0 बेहतर RAW शूटिंग क्षमताएं प्रदान करता है, जिससे प्रोफेशनल फोटोग्राफर एक्सपोज़र, ISO और व्हाइट बैलेंस को फाइन-ट्यून कर सकते हैं।


सामने की तरफ, 32MP Sony IMX709 सेल्फ़ी कैमरा शार्प और वाइब्रेंट सेल्फ़-पोर्ट्रेट सुनिश्चित करता है। यह 4K वीडियो रिकॉर्डिंग को भी सपोर्ट करता है - जो ज़्यादातर फ्रंट कैमरों में एक दुर्लभ फीचर है।


बैटरी और चार्जिंग

OnePlus 12 Pro को पावर देने के लिए 5,000mAh की डुअल-सेल बैटरी है, जिसे लंबे समय तक चलने और एफिशिएंसी के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह फ़ोन 100W SuperVOOC फ़ास्ट चार्जिंग को सपोर्ट करता है, जो डिवाइस को सिर्फ़ 22 मिनट में 0 से 100% तक चार्ज कर सकता है।


यह 50W AirVOOC वायरलेस चार्जिंग और 10W रिवर्स वायरलेस चार्जिंग को भी सपोर्ट करता है, जिससे ईयरबड्स या स्मार्टवॉच जैसी एक्सेसरीज़ को चार्ज करना आसान हो जाता है।


OnePlus का बैटरी हेल्थ इंजन फ़ास्ट चार्जिंग साइकिल के दौरान टूट-फूट को कम करके बैटरी की लाइफ़ बढ़ाता है, जिससे सालों इस्तेमाल के बाद भी लगातार परफ़ॉर्मेंस मिलती है।


कनेक्टिविटी और ऑडियो

OnePlus 12 Pro 5G डुअल सिम, Wi-Fi 7, ब्लूटूथ 5.4 और NFC को सपोर्ट करता है। USB 3.2 Gen 2 Type-C के शामिल होने से तेज़ डेटा ट्रांसफर स्पीड और ज़्यादा कम्पैटिबिलिटी मिलती है।


ऑडियो पसंद करने वालों के लिए, डुअल डॉल्बी एटमॉस स्टीरियो स्पीकर शानदार साउंड क्वालिटी देते हैं, जबकि Hi-Res ऑडियो सर्टिफ़िकेशन वायर्ड और वायरलेस हेडफ़ोन के लिए लॉसलेस प्लेबैक सुनिश्चित करता है।


सुरक्षा और बायोमेट्रिक्स

इस डिवाइस में इन-डिस्प्ले अल्ट्रासोनिक फ़िंगरप्रिंट सेंसर है।




वनप्लस 12 समरी

वनप्लस 12 मोबाइल 5 दिसंबर 2023 में लॉन्च हुआ था। यह फोन 120 Hz रिफ्रेश रेट 6.82-इंच टचस्क्रीन डिस्प्ले के साथ आता है जिसका रिजॉल्यूशन 1440x3168 पिक्सल (QHD+) है। इसका पिक्सल डेंसिटी 510 पिक्सल प्रति इंच (पीपीआई) आस्पेक्ट रेशियो हैं। डिस्प्ले में कई गोरिल्ला ग्लास प्रकार के प्रोटेक्शन भी हैं। वनप्लस 12 फोन 3.4GHz मेगाहर्ट्ज़ ऑक्टा-कोर स्नैपड्रैगन 8 जेन 3 प्रोसेसर के साथ आता है। वनप्लस 12 वायरलेस चार्जिंग, और सुपर वूक फास्ट चार्जिंग सपोर्ट के साथ आता है। 

वनप्लस 12 फोन एंड्रॉ़यड पर ऑपरेट होता है और इसमें 512 जीबी इनबिल्ट स्टोरेज है। वनप्लस 12 एक ड्यूल सिम (जीएसएम और जीएसएम) मोबाइल है जो नैनो सिम और नैनो सिम कार्ड्स के साथ आता है। वनप्लस 12 का डायमेंशन 164.30 x 75.80 x 9.15mm (height x width x thickness) और वजन 220.00 ग्राम है। फोन को Flowy Emerald और Silky Black कलर ऑप्शन के साथ लॉन्च किया गया है। इसमें डस्ट और वाटर प्रोटेक्शन के लिए आईपी65 रेटिंग है।

कनेक्टिविटी के लिए वनप्लस 12 में वाई-फाई 802.11 बी/जी/एन/एसी/एएक्स, जीपीएस, एनएफसी, इंफ्रारेड डायरेक्ट, यूएसबी टाइप सी, 3जी और 4जी (भारत में कुछ एलटीई नेटवर्क द्वारा उपयोग किए जाने वाले बैंड 40 के सपोर्ट के साथ) है। दोनों सिम कार्ड पर एक्टिव 4जी है। फोन में सेंसर की बात की जाएं तो एंबियंट लाइट सेंसर, एक्सेलेरोमीटर, कंपास/ मैगनेटोमीटर, जायरोस्कोप, प्रॉक्सिमिटी सेंसर और इन-डिस्प्ले फिंगरप्रिंट सेंसर है। वनप्लस 12 फेस अनलॉक के साथ है। 


Thursday, January 15, 2026

होटल जैसा आराम, जानें क्यों खास है भारत की पहली....

 भारतीय रेलवे एक बार फिर रेल यात्रा की परिभाषा बदलने की तैयारी में है। देश की पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन को लेकर आधिकारिक ऐलान हो चुका है। रेल, सूचना एवं प्रसारण तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने नई दिल्ली स्थित रेल भवन में बैठक के दौरान जानकारी दी कि इस ट्रेन के सभी ट्रायल, टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन सफलतापूर्वक पूरे कर लिए गए हैं। जनवरी महीने में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस ऐतिहासिक ट्रेन को गुवाहाटी-हावड़ा रूट पर हरी झंडी दिखाएंगे। रेल मंत्री के मुताबिक यह प्रोजेक्ट न सिर्फ भारतीय रेलवे बल्कि देश के यात्रियों के लिए भी एक बड़ा मील का पत्थर है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि साल 2026 भारतीय रेलवे के लिए सुधारों का साल होगा, जिसमें यात्रियों को केंद्र में रखकर कई बड़े फैसले लिए जाएंगे। 

तो आइए, इसी बहाने जानते हैं वंदे भारत स्लीपर ट्रेन के बारे में।



वंदे भारत स्लीपर ट्रेन के बारे में:

  • वंदे भारत स्लीपर ट्रेन, भारतीय रेलवे द्वारा विकसित एक सेमी-हाई-स्पीड स्वदेशी ट्रेन है, जिसे लंबी दूरी की रात्रिकालीन यात्रा के लिए डिजाइन किया गया है।
  • इसे BEML (बेंगलुरु) और ICF (चेन्नई) द्वारा संयुक्त रूप से निर्मित किया गया है। यह पूरी तरह से ‘मेक इन इंडिया’ प्रोजेक्ट का हिस्सा है।
  • परीक्षणों के दौरान इसने 180 किमी/घंटा की गति प्राप्त की है, जबकि इसका नियमित परिचालन 160 किमी/घंटा की रफ्तार पर होगा।
  • यह 16 कोचों वाली एक ‘सेल्फ-प्रोपल्शन’ ट्रेनसेट है (इसमें अलग से इंजन की आवश्यकता नहीं होती)। इसमें 11 एसी 3-टियर, 4 एसी 2-टियर और 1 प्रथम श्रेणी एसी कोच शामिल हैं।
  • इसके फर्स्ट एसी में शॉवर (नहाने की सुविधा), बायो-वैक्यूम शौचालय, सेंसर-आधारित नल, और ऊपरी बर्थ पर चढ़ने के लिए बेहतर सीढ़ियाँ दी गई हैं।
  • यह ट्रेन लगभग 823 से 1,128 यात्रियों को ले जाने में सक्षम है। 
  • यह स्वदेशी रूप से विकसित कवच’ (Kavach) ट्रेन सुरक्षा प्रणाली से लैस है, जो टक्कर रोकने में सक्षम है।
  • इसमें EN-45545 HL3 अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन करते हुए इसमें एरोसोल-आधारित आग बुझाने वाली प्रणालियाँ लगाई गई हैं।




सेमी-हाई-स्पीड ट्रेन से बदलेगा रात का सफर

वंदे भारत स्लीपर ट्रेन को खासतौर पर ओवरनाइट यात्रा के लिए डिजाइन किया गया है। यह एक सेमी-हाई-स्पीड ट्रेन है जिसकी डिजाइन स्पीड 180 किलोमीटर प्रति घंटा तक रखी गई है। रेलवे का उद्देश्य है कि ट्रेन शाम के समय अपने सोर्स स्टेशन से रवाना हो और अगली सुबह गंतव्य तक पहुंचे। इससे लंबी दूरी की यात्रा करने वाले यात्रियों का समय बचेगा और सफर अधिक सुविधाजनक होगा। यह ट्रेन असम और पश्चिम बंगाल के कई अहम जिलों को सीधे जोड़ती है। असम में कामरूप मेट्रोपॉलिटन और बोंगाईगांव जबकि पश्चिम बंगाल में कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, मालदा, मुर्शिदाबाद, पूर्व बर्धमान, हुगली और हावड़ा जैसे जिलों को इससे सीधे फायदा मिलेगा। इससे नॉर्थ-ईस्ट और पूर्वी भारत की कनेक्टिविटी को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।



स्लीपर ट्रेन का आधुनिक रूप

वंदे भारत स्लीपर ट्रेन को पारंपरिक स्लीपर ट्रेनों से बिल्कुल अलग अनुभव देने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। ट्रेन में कुल 16 कोच होंगे, जिनमें थ्री-टियर एसी, टू-टियर एसी और एक फर्स्ट क्लास एसी कोच शामिल है। लगभग 823 यात्रियों की क्षमता वाली इस ट्रेन में बर्थ को एर्गोनॉमिक डिजाइन के साथ तैयार किया गया है ताकि लंबी रात की यात्रा में भी शरीर पर कम दबाव पड़े। रेल मंत्री ने बताया कि ट्रेन के लिए पूरी तरह नया बोगी डिजाइन किया गया है, जिसमें नया सस्पेंशन सिस्टम लगाया गया है। इससे झटकों में कमी आएगी और शोर भी कम होगा। अंदरूनी सीढ़ियां और इंटीरियर भी इस तरह डिजाइन किए गए हैं कि यात्रियों को चलने-फिरने में आसानी हो और सुरक्षा बनी रहे।


आधुनिक तकनीक के साथ सुरक्षा

सुरक्षा के मोर्चे पर वंदे भारत स्लीपर ट्रेन को अत्याधुनिक तकनीकों से लैस किया गया है। इसमें कवच जैसी स्वदेशी ट्रेन सुरक्षा प्रणाली लगाई गई है, जो किसी और ट्रेन से टक्कर की आशंका को कम करती है। इसके अलावा सभी कोच में CCTV कैमरे लगाए गए हैं ताकि यात्रियों की सुरक्षा पर लगातार नजर रखी जा सके। आपात स्थिति में यात्री सीधे ट्रेन मैनेजर या लोको पायलट से संपर्क कर सकें, इसके लिए इमरजेंसी टॉक-बैक यूनिट दी गई है। साथ ही इलेक्ट्रिकल कैबिनेट और शौचालयों में एरोसोल बेस्ड फायर फायर डिटेक्शन और अग्निशमन सिस्टम लगाया गया है, जो आग लगने की स्थिति में तुरंत सक्रिय हो जाती है।


स्वच्छता, दिव्यांग सुविधा और आधुनिक ड्राइवर कैब

वंदे भारत स्लीपर ट्रेन में स्वच्छता को भी प्राथमिकता दी गई है। ट्रेन में डिसइंफेक्टेंट तकनीक का इस्तेमाल किया गया है ताकि उच्च स्तर की साफ-सफाई बनी रहे। दिव्यांग यात्रियों के लिए विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं, जिससे यह ट्रेन अधिक समावेशी बन सके। ड्राइवर कैब को भी आधुनिक नियंत्रण और सुरक्षा प्रणालियों से लैस किया गया है। ट्रेन का बाहरी स्वरूप एरोडायनामिक रखा गया है और ऑटोमैटिक बाहरी दरवाजे लगाए गए हैं, जो सेफ्टी और एनर्जी एफिशिएंसी दोनों में मदद करते हैं।



हाल ही में भारत की पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन की अंतिम उच्च-गति परीक्षण और रेलवे सुरक्षा आयुक्त (CRS) द्वारा प्रमाणन (certification) की प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी कर हो चुकी है। यह विकास भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है। 


महत्व: 

  • आत्मनिर्भर भारत: यह पूरी तरह से भारत में डिजाइन और निर्मित है, जो वैश्विक रेल निर्माण बाजार में भारत की स्थिति को मजबूत करता है।
  • समय की बचत: 160 किमी/घंटा की परिचालन गति के साथ, यह राजधानी एक्सप्रेस की तुलना में यात्रा समय में 15-20% की कटौती करेगी。
  • आर्थिक गलियारा: बेहतर रेल कनेक्टिविटी से उत्तर-पूर्व और पूर्वी भारत के बीच व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।
  • ऊर्जा दक्षता: पुनर्योजी ब्रेकिंग (Regenerative Braking) प्रणाली के कारण यह ट्रेन कम बिजली की खपत करती है। 

Saturday, January 10, 2026

हार में ही जीत है !

माँ को अपने बेटे, साहूकार को अपने देनदार और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भानु को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवत-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान। 


उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाक़े में न था। बाबा भानु उसे “सुलतान” कह कर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, ख़ुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। ऐसे लगन, ऐसे प्यार, ऐसे स्नेह से कोई सच्चा प्रेमी अपने प्यारे को भी न चाहता होगा। उन्होंने अपना सब-कुछ छोड़ दिया था, रुपया, माल, असबाब, ज़मीन, यहाँ तक कि उन्हें नागरिक जीवन से भी घृणा थी। अब गाँव से बाहर एक छोटे-से मंदिर में रहते और भगवान का भजन करते थे; परंतु सुलतान से बिछुड़ने की वेदना उनके लिए असह्य थी। मैं इसके बिना नहीं रह सकूँगा, उन्हें ऐसी भ्रांति-सी हो गई थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते, ऐसे चलता है जैसे मोर घन-घटा को देखकर नाच रहा हो। गाँवों के लोग इस प्रेम को देखकर चकित थे, कभी-कभी कनखियों से इशारे भी करते थे, परंतु बाबा भानु को इसकी परवा न थी। जब तक संध्या-समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।



दामोदर सिंह उस इलाक़े का प्रसिद्ध डाकू था। लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे। होते-होते सुलतान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची। उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। वह एक दिन दोपहर के समय बाबा भानु के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया।



बाबा भानु ने पूछा, “दामोदर सिंह, क्या हाल है?”

दामोदरसिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, “आपकी दया है।”


“कहो, इधर कैसे आ गए?”

“सुलतान की चाह खींच लाई।”


“विचित्र जानवर है। देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे।”

“मैंने भी बड़ी प्रशंसा सुनी है।”


“उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी!”

“कहते हैं देखने में भी बहुत सुंदर है।”


“क्या कहना! जो उसे एक बार देख लेता है, उसके हृदय पर उसकी छवि अंकित हो जाती है।”

“बहुत दिनों से अभिलाषा थी, आज उपस्थित हो सका हूँ।”


बाबा और दामोदर सिंह दोनों अस्तबल में पहुँचे। बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, दामोदर सिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से। उसने सैकड़ों घोड़े देखे थे, परंतु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से कभी न गुज़रा था। सोचने लगा, भाग्य की बात है। ऐसा घोड़ा दामोदर सिंह के पास होना चाहिए था। इस साधु को ऐसी चीज़ों से क्या लाभ? कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा। इसके पश्चात् हृदय में हलचल होने लगी। बालकों की-सी अधीरता से बोला, “परंतु बाबाजी, इसकी चाल न देखी तो क्या?”


बाबा जी भी मनुष्य ही थे। अपनी वस्तु की प्रशंसा दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय अधीर हो गया। घोड़े को खोलकर बाहर लाए और उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगे। एकाएक उचककर सवार हो गए। घोड़ा वायु-वेग से उड़ने लगा। उसकी चाल देखकर, उसकी गति देखकर दामोदर सिंह के हृदय पर साँप लोट गया। वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर अपना अधिकार समझता था। उसके पास बाहुबल था और आदमी भी। जाते-जाते उसने कहा, “बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।”



बाबा भानु डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती थी। सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी। प्रतिक्षण दामोदर सिंह का भय लगा रहता, परंतु कई मास बीत गए और वह न आया। यहाँ तक कि बाबा भानु कुछ लापरवाह हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नाई मिथ्या समझने लगे।

संध्या का समय था। बाबा भानु सुलतान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता। कभी घोड़े के शरीर को देखते, कभी उसके रंग को, और मन में फूले न समाते थे।



सहसा एक ओर से आवाज़ आई, “ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना।”

आवाज़ में करुणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया। देखा, एक अपाहिज वृक्ष की छाया में पड़ा कराह रहा है। बोले, “क्यों तुम्हें क्या कष्ट है?”


अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा, “बाबा, मैं दुखियारा हूँ। मुझ पर दया करो। रामाँवाला यहाँ से तीन मील है, मुझे वहाँ जाना है। घोड़े पर चढ़ा लो, परमात्मा भला करेगा।”

“वहाँ तुम्हारा कौन है?”


“दुर्गेश वैद्य का नाम आपने सुना होगा। मैं उनका सौतेला भाई हूँ।”



बाबा भानु ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे।


सहसा उन्हें एक झटका-सा लगा और लगाम हाथ से छूट गई। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है। उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख़ निकल गई। वह अपाहिज डाकू दामोदर सिंह था।

बाबा भानु कुछ देर तक चुप रहे और कुछ समय पश्चात् कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, “ज़रा ठहर जाओ।”



दामोदर सिंह ने यह आवाज़ सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गरदन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूँगा।”

“परंतु एक बात सुनते जाओ।”


दामोदर सिंह ठहर गया। बाबा भानु ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा क़साई की ओर देखता है और कहा, “यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है। मैं तुमसे इसे वापस करने के लिए न कहूँगा। परंतु दामोदर सिंह, केवल एक प्रार्थना करता हूँ। इसे अस्वीकार न करना, नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा।”


“बाबाजी, आज्ञा कीजिए। मैं आपका दास हूँ, केवल यह घोड़ा न दूँगा।”


“अब घोड़े का नाम न लो। मैं तुमसे इस विषय में कुछ न कहूँगा। मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।”

दामोदर सिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसका विचार था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भानु ने स्वयं उसे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? दामोदर सिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भानु के मुख पर गड़ा दीं और पूछा, “बाबाजी, इसमें आपको क्या डर है?”


सुनकर बाबा भानु ने उत्तर दिया, “लोगों को यदि इस घटना का पता लग गया तो वो किसी ग़रीब पर विश्वास न करेंगे।”

और यह कहते-कहते उन्होंने सुलतान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया जैसे उनका उससे कभी कोई संबंध ही न रहा हो। बाबा भानु चले गए। परंतु उनके शब्द दामोदर सिंह के कानों में उसी प्रकार गूँज रहे थे। सोचता था, कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है! उन्हें इस घोड़े से प्रेम था, इसे देखकर उनका मुख फूल की नाई खिल जाता था। कहते थे, “इसके बिना मैं रह न सकूँगा।” इसकी रखवाली में वे कई रात सोए नहीं। भजन-भक्ति न कर रखवाली करते रहे। परंतु आज उनके मुख पर दुःख की रेखा तक दिखाई न पड़ती थी। उन्हें केवल यह ख़याल था कि कहीं लोग ग़रीबों पर विश्वास करना न छोड़ दें। उन्होंने अपनी निज की हानि को मनुषयत्व की हानि पर न्योछावर कर दिया। ऐसा मनुष्य, मनुष्य नहीं देवता है।



रात्रि के अंधकार में दामोदर सिंह बाबा भानु के मंदिर पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था। आकाश पर तारे टिमटिमा रहे थे। थोड़ी दूर पर गाँवों के कुत्ते भौंक रहे थे। मंदिर के अंदर कोई शब्द सुनाई न देता था। दामोदर सिंह सुलतान की बाग पकड़े हुए था। वह धीरे-धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुँचा। फाटक किसी वियोगी की आँखों की तरह चौपट खुला था। किसी समय वहाँ बाबा भानु स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे, परंतु आज उन्हें किसी चोरी, किसी डाके का भय न था। हानि ने उन्हें हानि की तरफ़ से बे-परवाह कर दिया था। दामोदर सिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया। इस समय उसकी आँखों में नेकी के आँसू थे।

अंधकार में रात्रि ने तीसरा पहर समाप्त किया, और चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भानु ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया। उसके पश्चात्, इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो, उनके पाँव अस्तबल की ओर मुड़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई। साथ ही घोर निराशा ने पाँवों को मन-मन-भर का भारी बना दिया। वे वहीं रुक गए।



घोड़े ने स्वाभाविक मेघा से अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और ज़ोर से हिनहिनाया।

बाबा भानु  दौड़ते हुए अंदर घुसे, और अपने घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे, जैसे बिछुड़ा हुआ पिता चिरकाल के पश्चात् पुत्र से मिलकर रोता है। बार-बार उसकी पीठ पर हाथ फेरते, बार-बार उसके मुँह पर थपकियाँ देते और कहते थे “अब कोई ग़रीबों की सहायता से मुँह न मोड़ेगा।”


थोड़ी देर के बाद जब वह अस्तबल से बाहर निकले, तो उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। ये आँसू उसी भूमि पर ठीक उसी जगह गिर रहे थे, जहाँ बाहर निकलने के बाद दामोदर सिंह  खड़ा रोया था।

दोनों के आँसुओं का उसी भूमि की मिट्टी पर परस्पर मिलाप हो गया।


Wednesday, January 7, 2026

कफ़न में दफ़न, मस्ती में जग

एक झोंपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए थे और अंदर बेटे की जवान बीवी बिमला प्रसव-वेदना में चीख रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अंधकार में लय हो गया था। बिरजू ने कहा—“मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते हो गया, जा देख तो आ।”


राजेश चिढ़कर बोला—”मरना ही है तो जल्दी मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूँ?”

“तू बड़ा बेदर्द है बे! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफ़ाई!”



“तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।”

बनवाशी का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। बिरजू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। राजेश इतना कामचोर था कि आध घंटे काम करता तो घंटे भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कहीं मज़दूरी नहीं मिलती थी। घर में मुठ्ठी-भर भी अनाज मौजूद हो, तो उनके लिए काम करने की क़सम थी। जब दो-चार फ़ाक़े हो जाते तो बिरजू पेड़ पर चढ़कर लकड़ियाँ तोड़ लाता और राजेश बाज़ार से बेच लाता और जब तक वह पैसे रहते, दोनों इधर-उधर मारे-मारे फिरते। गाँव में काम की कमी न थी। 

किसानों का गाँव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे। मगर इन दोनों को उसी वक़्त बुलाते, जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी संतोष कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता। अगर दोनो साधु होते, तो उन्हें संतोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की बिलकुल ज़रूरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी। विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा कोई संपत्ति नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढाँके हुए जिए जाते थे। संसार की चिंताओं से मुक्त! क़र्ज़ से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई ग़म नहीं। दीन इतने कि वसूली की बिलकुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ क़र्ज़ दे देते थे। 

मटर, आलू की फ़सल में दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भानकर खा लेते या दस-पाँच ऊख उखाड़ लाते और रात को चूसते। बिरजू ने इसी आकाश-वृत्ति से साठ साल की उम्र काट दी और राजेश भी सपूत बेटे की तरह बाप ही के पद-चिह्नों पर चल रहा था, बल्कि उसका नाम और भी उजागर कर रहा था। इस वक़्त भी दोनों अलाव के सामने बैठकर आलू भून रहे थे, जो कि किसी खेत से खोद लाए थे। बिरजू की स्त्री का तो बहुत दिन हुए, देहांत हो गया था। राजेश का ब्याह पिछले साल हुआ था। जब से यह औरत आई थी, उसने इस ख़ानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनों बे-ग़ैरतों का दोज़ख़ भरती रहती थी। जब से वह आई, यह दोनों और भी आलसी और आरामतलब हो गए थे। बल्कि कुछ अकड़ने भी लगे थे। कोई कार्य करने को बुलाता, तो निर्ब्याज भाव से दुगुनी मज़दूरी माँगते। वही औरत आज प्रसव-वेदना से मर रही थी और यह दोनों इसी इंतज़ार में थे कि वह मर जाए, तो आराम से सोएँ।


बिरजू ने आलू निकालकर छीलते हुए कहा—“जाकर देख तो, क्या दशा है उसकी? चुड़ैल का फिसाद होगा, और क्या? यहाँ तो ओझा भी एक रुपया माँगता है!”

राजेश को भय था, कि वह कोठरी में गया, तो बिरजू आलुओं का बड़ा भाग साफ़ कर देगा। बोला- “मुझे वहाँ जाते डर लगता है।”


“डर किस बात का है, मैं तो यहाँ हूँ ही।”

“तो तुम्हीं जाकर देखो न?”


“मेरी औरत जब मरी थी, तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नहीं था! और फिर मुझसे लजाएगी कि नहीं? जिसका कभी मुँह नहीं देखा, आज उसका उघड़ा हुआ बदन देखूँ! उसे तन की सुध भी तो न होगी? मुझे देख लेगी तो खुलकर हाथ-पाँव भी न पटक सकेगी!”

“मैं सोचता हूँ कोई बाल-बच्चा हो गया तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में!”


“सब कुछ आ जाएगा। भगवान दें तो! जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वे ही कल बुलाकर रुपए देंगे। मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ न था, मगर भगवान ने किसी-न-किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।”

जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुक़ाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज़्यादा संपन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी। हम तो कहेंगे, बिरजू किसानों से कहीं ज़्यादा विचारवान था और किसानों के विचार-शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाज़ों की कुत्सित मंडली में जा मिला था। हाँ, उसमें यह शक्ति न थी, कि बैठकबाज़ों के नियम और नीति का पालन करता। इसलिए जहाँ उसकी मंडली के और लोग गाँव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव उँगली उठाता था। फिर भी उसे यह तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम-से-कम उसे किसानों की-सी जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फ़ायदा तो नहीं उठाते!


दोनों आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ नहीं खाया था। इतना सब्र न था कि ठंडा हो जाने दें। कई बार दोनों की ज़बानें जल गईं। छिल जाने पर आलू का बाहरी हिस्सा ज़बान, हलक और तालू को जला देता था और उस अंगारे को मुँह में रखने से ज़्यादा ख़ैरियत इसी में थी कि वह अंदर पहुँच जाए। वहाँ उसे ठंडा करने के लिए काफ़ी सामान थे। इसलिए दोनों जल्द-जल्द निगल जाते। हालाँकि इस कोशिश में उनकी आँखों से आँसू निकल आते।

बिरजू को उस वक़्त ठाकुर की बरात याद आई, जिसमें बीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वह उसके जीवन में एक याद रखने लायक़ बात थी, और आज भी उसकी याद ताज़ा थी, बोला—“वह भोज नहीं भूलता। तब से फिर उस तरह का खाना और भरपेट नहीं मिला। लड़की वालों ने सबको भर पेट पूरियाँ खिलाई थीं, सबको! छोटे-बड़े सबने पूरियाँ खाईं और असली घी की! चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई, अब क्या बताऊँ कि उस भोज में क्या स्वाद मिला। कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज़ चाहो, माँगो, जितना चाहो खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पिया गया। मगर परोसने वाले हैं कि पत्तल में गर्म-गर्म, गोल-गोल सुवासित कचौरियाँ डाल देते हैं। मना करते हैं कि नहीं चाहिए, पत्तल पर हाथ रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिए जाते हैं। और जब सबने मुँह धो लिया, तो पान-इलायची भी मिली। मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुध थी? खड़ा हुआ न जाता था। चटपट जाकर अपने कंबल पर लेट गया। ऐसा दिल-दरियाव था वह ठाकुर!”




राजेश ने इन पदार्थों का मन-ही-मन मज़ा लेते हुए कहा—“अब हमें कोई ऐसा भोज नहीं खिलाता।”

“अब कोई क्या खिलाएगा? वह ज़माना दूसरा था। अब तो सबको किफ़ायत सूझती है। शादी-ब्याह में मत ख़र्च करो, क्रिया-कर्म में मत ख़र्च करो। पूछो, ग़रीबों का माल बटोर-बटोरकर कहाँ रखोगे? बटोरने में तो कमी नहीं है। हाँ, ख़र्च में किफ़ायत सूझती है!”


“तुमने एक बीस पूरियाँ खाई होंगी?”

“बीस से ज़ियादा खाई थीं!”


“मैं पचास खा जाता!”

“पचास से कम मैंने न खाई होंगी। अच्छा पका था। तू तो मेरा आधा भी नहीं है।”


आलू खाकर दोनों ने पानी पिया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़कर पाँव पेट में डाले सो रहे। जैसे दो बड़े-बड़े अजगर गेंडुलियाँ मारे पड़े हों। और बुधिया अभी तक कराह रही थी।

दो


सवेरे राजेश ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी स्त्री ठंडी हो गई थी। उसके मुँह पर मक्खियाँ भिनक रही थीं। पथराई हुई आँखें ऊपर टँगी हुई थीं। सारी देह धूल से लथपथ हो रही थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था।

राजेश भागा हुआ बिरजू के पास आया। फिर दोनों ज़ोर-ज़ोर से हाय-हाय करने और छाती पीटने लगे। पड़ोस वालों ने यह रोना-धोना सुना, तो दौड़े हुए आए और पुरानी मर्यादा के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे।


मगर ज़्यादा रोने-पीटने का अवसर न था। कफ़न की और लकड़ी की फ़िक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह ग़ायब था, जैसे चील के घोंसले में माँस?


बाप-बेटे रोते हुए गाँव के ज़मींदार के पास गए। वह इन दोनों की सूरत से नफ़रत करते थे। कई बार इन्हें अपने हाथों से पीट चुके थे। चोरी करने के लिए, वादे पर काम पर न आने के लिए। पूछा—“क्या है बे बिरजूआ, रोता क्यों है? अब तो तू कहीं दिखलाई भी नहीं देता! मालूम होता है, इस गाँव में रहना नहीं चाहता।”


बिरजू ने ज़मीन पर सिर रखकर आँखों में आँसू भरे हुए कहा—“सरकार! बड़ी विपत्ति में हूँ। राजेश की घरवाली रात को गुज़र गई। रात-भर तड़पती रही सरकार! हम दोनों उसके सिरहाने बैठे रहे। दवा-दारू जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, मुदा वह हमें दग़ा दे गई। अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रहा मालिक! तबाह हो गए। घर उजड़ गया। आपका ग़ुलाम हूँ, अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगाएगा। हमारे हाथ में तो जो कुछ था, वह सब तो दवा-दारू में उठ गया। सरकार ही की दया होगी, तो उसकी मिट्टी उठेगी। आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊँ।”

ज़मींदार साहब दयालु थे। मगर बिरजू पर दया करना काले कंबल पर रंग चढ़ाना था। जी में तो आया, कह दें, चल, दूर हो यहाँ से। यूँ तो बुलाने से भी नहीं आता, आज जब ग़रज़ पड़ी तो आकर ख़ुशामद कर रहा है। हरामख़ोर कहीं का, बदमाश! लेकिन यह क्रोध या दंड देने का अवसर न था।


जी में कुढ़ते हुए दो रुपए निकालकर फेंक दिए। मगर सांत्वना का एक शब्द भी मुँह से न निकला। उसकी तरफ़ ताका तक नहीं। जैसे सिर का बोझ उतारा हो।

जब ज़मींदार साहब ने दो रुपए दिए, तो गाँव के बनिए-महाजनों को इनकार का साहस कैसे होता? बिरजू ज़मींदार के नाम का ढिंढोरा भी पीटना ख़ूब जानता था। किसी ने दो आने दिए, किसी ने चारे आने। एक घंटे में बिरजू के पास पाँच रुपए की अच्छी रक़म जमा हो गई। कहीं से अनाज मिल गया, कहीं से लकड़ी। और दोपहर को बिरजू और राजेश बाज़ार से कफ़न लाने चले। इधर लोग बाँस-वाँस काटने लगे।


गाँव की नर्म दिल स्त्रियाँ आ-आकर लाश देखती थीं और उसकी बेकसी पर दो बूँद आँसू गिराकर चली जाती थीं।

तीन


बाज़ार में पहुँचकर बिरजू बोला—“लकड़ी तो उसे जलाने-भर को मिल गई है, क्यों राजेश!”

राजेश बोला—“हाँ, लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिए।”


“तो चलो, कोई हलक़ा-सा कफ़न ले लें।”

“हाँ, और क्या! लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफ़न कौन देखता है?”


“कैसा बुरा रिवाज़ है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए।”

“कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है।”


“और क्या रखा रहता है? यही पाँच रुपए पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारू कर लेते।”

दोनों एक-दूसरे के मन की बात ताड़ रहे थे। बाज़ार में इधर-उधर घूमते रहे। कभी इस बाज़ार की दूकान पर गए, कभी उसकी दूकान पर! तरह-तरह के कपड़े, रेशमी और सूती देखे, मगर कुछ जँचा नहीं। यहाँ तक कि शाम हो गई। तब दोनों न जाने किस दैवी प्रेरणा से एक मधुशाला के सामने जा पहुँचे। और जैसे किसी पूर्व निश्चित व्यवस्था से अंदर चले गए। वहाँ ज़रा देर तक दोनों असमंजस में खड़े रहे। फिर बिरजू ने गद्दी के सामने जाकर कहा—“साहूजी, एक बोतल हमें भी देना।”


इसके बाद कुछ चिखौना आया, तली हुई मछली आईं और दोनों बरामदे में बैठकर शांतिपूर्वक पीने लगे।



कई कुज्जियाँ ताबड़तोड़ पीने के बाद दोनों सरूर में आ गए। बिरजू बोला—“कफ़न लगाने से क्या मिलता? आख़िर जल ही तो जाता। कुछ बहू के साथ तो न जाता।”


राजेश आसमान की तरफ़ देखकर बोला, मानों देवताओं को अपनी निष्पापता का साक्षी बना रहा हो—“दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग बामनों को हज़ारों रुपए क्यों दे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं!”

“बड़े आदमियों के पास धन है, फूँके। हमारे पास फूँकने को क्या है?”


“लेकिन लोगों को जवाब क्या दोगे? लोग पूछेंगे नहीं, कफ़न कहाँ है?”

बिरजू हँसा—“अबे, कह देंगे कि रुपए कमर से खिसक गए। बहुत ढूँढ़ा, मिले नहीं। लोगों को विश्वास न आएगा, लेकिन फिर वही रुपए देंगे।”


राजेश भी हँसा, इस अनपेक्षित सौभाग्य पर बोला—“बड़ी अच्छी थी बेचारी! मरी तो ख़ूब खिला-पिलाकर!”

आधी बोतल से ज़्यादा उड़ गई। बिरजू ने दो सेर पूरियाँ मँगाई। चटनी, अचार, कलेजियाँ। शराबख़ाने के सामने ही दूकान थी। राजेश लपककर दो पत्तलों में सारे सामान ले आया। पूरा डेढ़ रुपया ख़र्च हो गया। सिर्फ़ थोड़े से पैसे बच रहे।


दोनों इस वक़्त इस शान में बैठे पूरियाँ खा रहे थे जैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ा रहा हो। न जवाबदेही का ख़ौफ़ था, न बदनामी की फ़िक्र। इन भावनाओं को उन्होंने बहुत पहले ही जीत लिया था।

बिरजू दार्शनिक भाव से बोला—“हमारी आत्मा प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुन्न न होगा?”


राजेश ने श्रद्धा से सिर झुकाकर तसदीक़ की—“ज़रूर से ज़रूर होगा। भगवान, तुम अंतर्यामी हो। उसे बैकुंठ ले जाना। हम दोनों हृदय से आशीर्वाद दे रहे हैं। आज जो भोजन मिला वह कभी उम्र-भर न मिला था।”

एक क्षण के बाद राजेश के मन में एक शंका जागी। बोला—“क्यों दादा, हम लोग भी एक-न-एक दिन वहाँ जाएँगे ही?”


बिरजू ने इस भोले-भाले सवाल का कुछ उत्तर न दिया। वह परलोक की बातें सोचकर इस आनंद में बाधा न डालना चाहता था।

“जो वहाँ वह हम लोगों से पूछे कि तुमने हमें कफ़न क्यों नहीं दिया तो क्या कहोगे?”


“कहेंगे तुम्हारा सिर!”

“पूछेगी तो ज़रूर!”


“तू कैसे जानता है कि उसे कफ़न न मिलेगा? तू मुझे ऐसा गधा समझता है? साठ साल क्या दुनिया में घास खोदता रहा हूँ? उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा!”

राजेश को विश्वास न आया। बोला—“कौन देगा? रुपए तो तुमने चट कर दिए। वह तो मुझसे पूछेगी। उसकी माँग में तो सेंदुर मैंने डाला था।”


“कौन देगा, बताते क्यों नहीं?”

“वही लोग देंगे, जिन्होंने अबकी दिया। हाँ, अबकी रुपए हमारे हाथ न आएँगे।”


ज्यों-ज्यों अँधेरा बढ़ता था और सितारों की चमक तेज़ होती थी, मधुशाला की रौनक भी बढ़ती जाती थी। कोई गाता था, कोई डींग मारता था, कोई अपने संगी के गले लिपटा जाता था। कोई अपने दोस्त के मुँह में कुल्हड़ लगाए देता था।

वहाँ के वातावरण में सुरूर था, हवा में नशा। कितने तो यहाँ आकर एक चुल्लू में मस्त हो जाते थे। शराब से ज़्यादा यहाँ की हवा उन पर नशा करती थी। जीवन की बाधाएँ यहाँ खींच लाती थीं और कुछ देर के लिए यह भूल जाते थे कि वे जीते हैं या मरते हैं। या न जीते हैं, न मरते हैं।


और यह दोनों बाप-बेटे अब भी मज़े ले-लेकर चुसकियाँ ले रहे थे। सबकी निगाहें इनकी ओर जमी हुई थीं। दोनों कितने भाग्य के बली हैं! पूरी बोतल बीच में है।

भरपेट खाकर राजेश ने बची हुई पूरियों का पत्तल उठाकर एक भिखारी को दे दिया, जो खड़ा इनकी ओर भूखी आँखों से देख रहा था। और देने के गौरव, आनंद और उल्लास का अपने जीवन में पहली बार अनुभव किया।


बिरजू ने कहा—“ले जा, ख़ूब खा और आशीर्वाद दे! जिसकी कमाई है, वह तो मर गई। मगर तेरा आशीर्वाद उसे ज़रूर पहुँचेगा। रोएँ-रोएँ से आशीर्वाद दो, बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे हैं!”

राजेश ने फिर आसमान की तरफ़ देखकर कहा—“वह बैकुंठ में जाएगी दादा, बैकुंठ की रानी बनेगी।”


बिरजू खड़ा हो गया और जैसे उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला—“हाँ, बेटा बैकुंठ में जाएगी। किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं। मरते-मरते हमारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गई। वह न बैकुंठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो ग़रीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चढ़ाते हैं?

श्रद्धालुता का यह रंग तुरंत ही बदल गया। अस्थिरता नशे की ख़ासियत है। दु:ख और निराशा का दौरा हुआ।


राजेश बोला—“मगर दादा, बेचारी ने ज़िंदगी में बड़ा दुख भोगा। कितना दुख झेलकर मरी!”

वह आँखों पर हाथ रखकर रोने लगा। चीखें मार-मारकर।


बिरजू ने समझाया—“क्यों रोता है बेटा, ख़ुश हो कि वह माया-जाल से मुक्त हो गई, जंजाल से छूट गई। बड़ी भाग्यवान थी, जो इतनी जल्द माया-मोह के बंधन तोड़ दिए।

और दोनों खड़े होकर गाने लगे—


“ठगिनी क्यों नैना झमकावे! ठगिनी!”

पियक्कड़ों की आँखें इनकी ओर लगी हुई थीं और यह दोनों अपने दिल में मस्त गाए जाते थे। फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी। गिरे भी, मटके भी। भाव भी बनाए, अभिनय भी किए। और आख़िर नशे में मदमस्त होकर वहीं गिर पड़े।